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उत्तराखंड का वो वीर योद्धा जिसने अकेले 300 चीनी सैनिकों को कर दिया ढेर, शहीद के बाद भी मिला प्रमोशन… जानें जसवंत सिंह रावत की कहानी

Jaswant Singh Rawat story : 1962 में भारत-चीन युद्ध की जब भी बात होती है, भारतीय सेना के जिन वीर सपूतों का नाम सबसे पहले लिया जाता है, उनमें से एक हैं राइफलमैन जसवंत सिंह रावत। यह वही नाम है जो न केवल दुश्मनों के लिए काल साबित हुआ, बल्कि मरने के बाद भी सेना में प्रमोशन पाने वाले एकमात्र सैनिक बने।

उत्तराखंड के सपूत की वीरगाथा

बता दें कि 19 अगस्त 1941 को उत्तराखंड के पौड़ी-गढ़वाल जिले के बादयूं गांव में जन्मे जसवंत सिंह रावत 19 साल की उम्र में 1960 में सेना में भर्ती हुए थे। 14 सितंबर 1961 को उन्होंने अपनी सैन्य ट्रेनिंग पूरी की और इसके एक साल बाद ही उन्हें वह ऐतिहासिक मोर्चा मिला, जहां उन्होंने वीरता की मिसाल कायम कर दी।

17 नवंबर 1962: जब एक जवान बना चीन की तबाही का कारण

अरुणाचल प्रदेश के सेला टॉप पर तैनात गढ़वाल राइफल्स की डेल्टा कंपनी में जसवंत सिंह रावत शामिल थे। बता दें 17 नवंबर को सुबह करीब 5 बजे चीनी सेना ने हमला बोल दिया। हालात बिगड़ते देख भारतीय सेना ने यूनिट को पीछे हटने का आदेश दिया, लेकिन जसवंत सिंह रावत, लांस नायक त्रिलोकी सिंह नेगी और गोपाल गुसाई मोर्चे पर डटे रहे। तीनों सैनिक चीनी बंकर के करीब पहुंचकर भारी गोलीबारी के बीच हैंड ग्रेनेड से हमला करते हुए दुश्मन की मशीनगन छीन लाए। इस साहसिक कार्रवाई से युद्ध का रुख ही पलट गया और चीन की योजना विफल हो गई।

तीन दिन और तीन सौ चीनी सैनिक ढेर…

अगले 72 घंटे तक जसवंत सिंह ने दुश्मन को अकेले मोर्चा संभालते हुए रोके रखा। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने करीब 300 चीनी सैनिकों को मार गिराया। हालांकि अंत में चीनी सेना ने उन्हें घेर लिया और उनका सिर काटकर ले गई। 20 नवंबर को चीन ने युद्धविराम की घोषणा कर दी।

शहीद के बाद भी मिला प्रमोशन और सम्मान

राइफलमैन रावत को 1962 के युद्ध के दौरान उनकी बहादुरी के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। जसवंत सिंह रावत भारतीय सेना के एकमात्र सैनिक हैं जिन्हें मरणोपरांत पदोन्नति दी गई। पहले वह नायक बने, फिर कैप्टन और फिर मेजर जनरल। इस दौरान उनका पूरा वेतन भी उनके परिवार को पहुंचा दिया गया। अरुणाचल प्रदेश के लोग आज भी उन्हें शहीद नहीं मानते हैं उनका मानना है कि वह आज भी सीमा की रक्षा कर रहे हैं। उनकी स्मृति में अरुणाचल के जसवंतगढ़ में एक मंदिर जैसा स्मारक बनाया गया है, जहां रोजाना उनकी वर्दी बदली जाती है, भोजन परोसा जाता है और ड्यूटी रोस्टर भी तैयार होता है। माना जाता है कि वह आज भी सीमा की सुरक्षा कर रहे हैं। शहीद जसतंव सिंह रावत के शौर्य गाथा पर बनी फिल्म ’72 आवर्स: मारटायर हू नेवर डायड’ बनी है।

फिल्म में अमर हुआ शौर्य

उनकी वीरता की कहानी को लेकर ’72 आवर्स: मार्टायर हू नेवर डाइड’ नामक फिल्म भी बनाई गई है, जो उनकी बहादुरी को नई पीढ़ी तक पहुंचाती है। जसवंत सिंह रावत एक नाम नहीं, एक प्रतीक हैं — देशभक्ति, बलिदान और अटूट साहस का प्रतीक।

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