नेशनल डेस्क : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा के श्री कृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद विवाद से जुड़ी एक अहम अंतरिम टिप्पणी की है, जिसे लेकर पूरे देश में चर्चाएं और बहस छिड़ गई हैं। हाईकोर्ट ने पुराणों को लेकर जो टिप्पणी की, वह चर्चा का केंद्र बन गई है। कोर्ट ने कहा है कि पुराण “प्रामाणिक नहीं” हैं और उन्हें कानूनी दृष्टिकोण से “प्रत्यक्ष सबूत” के रूप में नहीं माना जा सकता। आइए जानते है इस खबर को विस्तार से…
क्या है मथुरा विवाद?
आपको बता दें कि मथुरा का विवाद 13.37 एकड़ जमीन को लेकर है, जो श्री कृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद के बीच स्थित है। इस विवाद में देवी श्री जी राधा रानी को पक्षकार बनाए जाने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह की तरफ से दायर अर्जी में यह दावा किया गया था कि राधा रानी भगवान श्री कृष्ण की पहली पत्नी थीं, और वह उनकी आत्मा मानी जाती हैं, इसलिए उन्हें मथुरा के विवाद में पक्षकार बनाया जाना चाहिए।
कोर्ट ने क्यों खारिज किया याचिका?
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पुराणों में लिखी घटनाएं “सुनी-सुनाई बातें” हैं, जो “कानूनी संदर्भ में प्रत्यक्ष सबूत” के रूप में नहीं मानी जा सकतीं। पौराणिक कथाएं आमतौर पर कथात्मक होती हैं, जो किसी गवाह या प्रत्यक्ष प्रमाण पर आधारित नहीं होतीं। इसलिए केवल पुराणों और पौराणिक तथ्यों के आधार पर राधा रानी को पक्षकार बनाए जाने की मांग को अदालत ने खारिज कर दिया।
कथाओं को प्रमाण के रूप में नहीं माना…
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पौराणिक चित्रण और कहानियां आमतौर पर ग्राफिक प्रतिनिधित्व होती हैं, जो घटनाओं की सच्चाई का केवल कथा आधारित चित्रण होती हैं। इन कथाओं को कानूनी संदर्भ में प्रमाण के रूप में नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने पुराणों को लेकर दी गई दलील को नकारते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
अदालत का निर्देश
अदालत ने याचिकाकर्ता से यह भी कहा कि यदि किसी को पक्षकार बनाना है तो उसे पर्याप्त प्रमाण और ठोस आधार प्रस्तुत करने होंगे। अदालत ने कहा कि यह साबित करना होगा कि राधा रानी का विवादित जमीन से सीधा नाता रहा है और वहां उनका मंदिर भी स्थित था। पौराणिक तथ्यों और दलीलों के आधार पर यह दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कहां से उठी थी पक्षकार बनाने की मांग?
यह मांग रीना एन सिंह द्वारा उठाई गई थी, जिन्होंने दावा किया था कि पुराणों और संहिताओं में राधा रानी को भगवान कृष्ण की आत्मा के रूप में वर्णित किया गया है। उनका कहना था कि श्री कृष्ण की जन्मस्थली, जो वर्तमान में शाही ईदगाह मस्जिद के कब्जे में है, वहां राधा रानी का भी अधिकार होना चाहिए क्योंकि वह श्री कृष्ण के साथ संयुक्त रूप से विराजमान थीं। इस आधार पर उन्हें मथुरा मंदिर-मस्जिद विवाद में पक्षकार बनाए जाने की अपील की गई थी।
कोर्ट का फैसला
अदालत ने इस दलील को नकारते हुए फैसला सुनाया कि पुराणों के आधार पर इस तरह के दावे को कानूनी रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता। 23 मई 2025 को हुई सुनवाई के बाद, सोमवार की शाम को यह फैसला हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला मथुरा के विवादित मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहां पुराणों और पौराणिक कथाओं को कानूनी सबूत के रूप में नकारा गया है। इस फैसले के बाद, अब यह स्पष्ट हो गया है कि कानूनी प्रक्रिया में केवल प्रत्यक्ष प्रमाण और साक्ष्यों को ही महत्वपूर्ण माना जाएगा, न कि पौराणिक कथाओं को। इस फैसले ने मथुरा विवाद को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई को और भी अधिक पेचिदा बना दिया है।
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