Last Updated: September 27, 2026

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लद्दाख क्यों जल रहा है…? मोदी सरकार पर भड़की महबूबा मुफ्ती

September 26, 2025

लद्दाख क्यों जल रहा है…? मोदी सरकार पर भड़की महबूबा मुफ्ती

जम्मू-कश्मीर डेस्क. लद्दाख के लेह में राज्य की मांग को लेकर हिंसा भड़की हुई है। इस पर पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी चीफ महबूबा मुफ्ती ने भी अपने विचार पेश किए हैं। उन्होंने कहा कि बीजेपी की सरकार अगर इसी तरह लद्दाख को डील करती रही तो आने वाले समय में बहुत बड़ा खतरा हो सकता है। जम्मू कश्मीर में जो हुआ सो हुआ। जम्मू-कश्मीर को एक खुली जेल में तब्दील किया गया है। यहां तो आप बात नहीं कर सकते। लद्दाख में जो हुआ वो हम सब ने देखा लेकिन अगर कोई जम्मू कश्मीर में बात करता है तो पीएसए और यूएपीए के तहत जेल में डाल देते हैं।

महबूबा मुफ्ती ने आगे कहा, “लद्दाख क्यों जल रहा है? क्योंकि केंद्र सरकार की नीति ही गलत है। 2019 के बाद से जो शुरुआत हुई थी, लद्दाख की आज की स्थिति उसी का नतीजा है। चीन पहले ही 5000 स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर चुका है। और अब अगर बीजेपी इसी तरह लद्दाख को संभालती रही, तो आने वाले समय में स्थिति बेहद ख़तरनाक हो सकती है।”

2019 के फैसले और लद्दाख की स्थिति

महबूबा मुफ्ती ने कहा कि 2019 में अनुच्छेद 370 हटाकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। लद्दाख के लोगों ने पहले इस फैसले का स्वागत किया, उन्हें लगा कि इससे उन्हें ज्यादा अधिकार मिलेंगे। लेकिन अब उन्हें लग रहा है कि वो पहले से ज़्यादा असुरक्षित हो गए हैं।

जमीन और पहचान को लेकर चिंता

मुफ्ती ने लद्दाख की स्थानीय समस्याओं पर भी बात की। उन्होंने कहा कि सेना के पास पहले से ही लद्दाख की अधिकांश जमीन है। अब जो बची हुई जमीन है, उस पर बड़े बिजनेस ग्रुप्स, होटल चेन और रियल एस्टेट कंपनियों की नजरें हैं। डेवलपमेंट के नाम पर लोगों से ज़मीन छीनी जा रही है और वहां के लोग डरे हुए हैं कि अगर अब नहीं बोले, तो सब कुछ खो देंगे।

जम्मू-कश्मीर की तुलना में लद्दाख की हालत

महबूबा मुफ्ती का कहना है कि जम्मू-कश्मीर तो एक खुली जेल बन चुका है। यहां बोलने की आज़ादी नहीं है। अगर कोई कुछ कहता है, तो PSA या UAPA जैसी कठोर धाराएं लगाकर जेल भेज दिया जाता है।

लद्दाख के लोग क्यों हो रहे हैं नाराज़?

पहले उन्हें लगा कि केंद्र शासित प्रदेश बनने से ज्यादा अधिकार और सीधे विकास मिलेगा। लेकिन अब उन्हें डर है कि उनकी पहचान खतरे में है। ज़मीन और संसाधन छीने जा रहे हैं और वो अपने ही क्षेत्र में अल्पसंख्यक बन सकते हैं।

 

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