नई दिल्ली: IDBI बैंक में केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की हिस्सेदारी बेचने के फैसले को लेकर कांग्रेस और केंद्र सरकार के बीच विवाद बढ़ गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जहां बैंक की हिस्सेदारी बेचने के फैसले पर सवाल उठाए हैं, वहीं केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए पिछली सरकारों के दौरान बैंकिंग व्यवस्था में राजनीतिक दखल और बड़े कारोबारियों को नियमों के खिलाफ कर्ज देने के आरोप लगाए हैं।
निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में ताकतवर लोगों के लिए फोनबुक और आम लोगों के लिए रूलबुक थी। उनका कहना था कि पहले राजनीतिक संपर्क रखने वाले लोगों को बैंक से आसानी से कर्ज मिल जाता था, जबकि आम लोगों को कर्ज लेने के लिए कई नियमों और प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता था।
वित्त मंत्री ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकारों के समय बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर राजनीतिक दबाव बनाया जाता था। उन्होंने कहा कि बैंक अधिकारियों को कई बार कर्ज देने के नियमों की अनदेखी करने के लिए मजबूर किया गया।
सीतारमण ने गिनाईं कांग्रेस शासनकाल की घटनाएं
वित्त मंत्री ने अपने पोस्ट में कांग्रेस सरकारों के समय की कुछ पुरानी घटनाओं का जिक्र किया। उन्होंने 1957 के मुंद्रा घोटाले से लेकर UPA सरकार के कार्यकाल तक बैंकिंग व्यवस्था में कथित राजनीतिक हस्तक्षेप के उदाहरण दिए। सीतारमण ने कहा कि 1957 में हरिदास मुंद्रा को कांग्रेस नेताओं के प्रभाव के चलते LIC से निवेश मिला था। इसके अलावा उन्होंने 1976 में SBI के तत्कालीन चेयरमैन आरके तलवार को हटाए जाने का मामला उठाया। उनके मुताबिक, आरके तलवार ने संजय गांधी से जुड़े एक कारोबारी समूह को कर्ज देने की शर्तों में ढील देने के राजनीतिक दबाव को स्वीकार नहीं किया था। इसके बाद उन्हें पद से हटा दिया गया था।
वित्त मंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि संजय गांधी ने मारुति कंपनी को कर्ज दिलाने के लिए सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया पर दबाव बनाया था। उन्होंने 1980 के दशक में तत्कालीन वित्त राज्य मंत्री बी. जनार्दन पुजारी और UPA सरकार के दौरान पवन कुमार बंसल से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया। सीतारमण का आरोप है कि इन घटनाओं से पता चलता है कि पिछली सरकारों के समय बैंकिंग व्यवस्था में राजनीतिक दखल किस तरह होता था।
IDBI बैंक की खराब हालत के लिए कांग्रेस को ठहराया जिम्मेदार
वित्त मंत्री ने IDBI बैंक की पुरानी वित्तीय स्थिति को लेकर भी कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकारों के दौरान बैंक को कई बड़े कारोबारी समूहों को कर्ज देने के लिए मजबूर किया गया था। उन्होंने वीडियोकॉन, विनसम, ABG शिपयार्ड और किंगफिशर जैसे कारोबारी समूहों का नाम लेते हुए कहा कि इन कंपनियों को दिए गए कई कर्ज बाद में फंस गए। इससे बैंक पर गैर-निष्पादित संपत्तियों (NPA) का बोझ बढ़ा और उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा।
NPA ऐसे कर्ज होते हैं, जिनकी किस्त या ब्याज तय समय तक बैंक को वापस नहीं मिलता। जब कोई कर्ज लंबे समय तक नहीं चुकाया जाता, तो बैंक उसे NPA की श्रेणी में रखता है। सीतारमण ने कहा कि मौजूदा सरकार को IDBI बैंक कमजोर वित्तीय स्थिति में मिला था और उसे दोबारा मजबूत बनाने के लिए बड़े स्तर पर काम करना पड़ा।
25 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश करने का दावा
निर्मला सीतारमण ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली NDA सरकार ने IDBI बैंक को मजबूत करने के लिए पेशेवर प्रबंधन और वित्तीय सुधारों पर ध्यान दिया। उन्होंने दावा किया कि सरकार ने बैंक के पुनर्गठन और उसे आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए 25,000 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी उपलब्ध कराई। उनके मुताबिक, अब बैंक की स्थिति में सुधार हुआ है और वह विकास के अगले चरण के लिए तैयार है। वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि सरकार ने बैंक की हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया में जरूरी नियमों, स्वतंत्र मूल्यांकन और पारदर्शी बोली प्रक्रिया का पालन किया है।
बैंक की बिक्री की कीमत और बोली प्रक्रिया पर भी दी सफाई
IDBI बैंक की बिक्री को लेकर उठ रहे सवालों के बीच वित्त मंत्रालय ने बोली प्रक्रिया पर भी सफाई दी है। मंत्रालय के मुताबिक, बैंक की हिस्सेदारी बेचने के लिए पहले वित्त वर्ष 2025-26 में बोली मंगाई गई थी। इसके बाद दूसरे चरण में योग्य बोलीदाताओं से बेहतर प्रस्ताव मांगे गए। सरकार ने स्पष्ट किया कि दूसरे चरण में बैंक की रिजर्व प्राइस यानी न्यूनतम तय कीमत में कोई बदलाव नहीं किया गया। मंत्रालय का कहना है कि दूसरी बोली प्रक्रिया के बाद मिली कीमत पहले के मुकाबले 3,917 करोड़ रुपये बढ़ गई।
बैंक का मूल्यांकन करने के लिए दो स्वतंत्र सलाहकारों की मदद ली गई। दोनों ने अलग-अलग तरीकों से बैंक की संपत्ति और कारोबार की कीमत का आकलन किया। मंत्रालय के अनुसार, बोली लगाने वाली कंपनियों को स्वतंत्र मूल्यांकन की जानकारी नहीं थी और मूल्यांकन करने वाली एजेंसियों को भी बोली की जानकारी नहीं दी गई थी। दोनों का मिलान करने की जिम्मेदारी संबंधित सरकारी समिति के पास थी। सरकार का कहना है कि इस प्रक्रिया से बैंक की बिक्री से मिलने वाली रकम बढ़ाने में मदद मिली।
राहुल गांधी ने निजीकरण के फैसले पर उठाए सवाल
दूसरी ओर, कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने IDBI बैंक की हिस्सेदारी बेचने के फैसले की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के समय में IDBI की स्थापना देश के उद्योगों को वित्तीय सहायता देने के उद्देश्य से की गई थी, जबकि मौजूदा सरकार बैंक को बेचने की तैयारी कर रही है। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि कांग्रेस के समय बैंक बनाए जा रहे थे, जबकि मोदी सरकार के समय उन्हें बेचा जा रहा है। उन्होंने IDBI बैंक के कर्मचारियों को लिखे पत्र में निजीकरण को लेकर चिंता जताई।
राहुल गांधी ने कहा कि बैंक के निजी हाथों में जाने से कर्मचारियों के अधिकारों और नौकरी की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। उन्होंने यह आशंका भी जताई कि निजीकरण के बाद अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उम्मीदवारों को मिलने वाले आरक्षण पर असर पड़ सकता है। साथ ही उन्होंने कर्मचारियों की सेवा शर्तों और पेंशन से जुड़े मुद्दों को भी उठाया। राहुल गांधी ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केवल संपत्ति नहीं हैं, बल्कि देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
क्या है IDBI बैंक की हिस्सेदारी बेचने का पूरा मामला?
केंद्र सरकार ने 14 अक्टूबर को IDBI बैंक में अपनी और LIC की कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इस सौदे की कुल कीमत 52,878 करोड़ रुपये तय की गई है। यह हिस्सेदारी कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की सहायक कंपनी 10955230 Canada Inc. को बेची जाएगी।
इस सौदे के तहत केंद्र सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगी, जबकि LIC अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगी। इस तरह कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी नए निवेशक के पास जाएगी। सौदा पूरा होने के बाद केंद्र सरकार के पास IDBI बैंक की 15 प्रतिशत और LIC के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी बची रहेगी। यानी सरकार और LIC पूरी तरह बैंक से बाहर नहीं होंगे, बल्कि उनकी हिस्सेदारी कम हो जाएगी।
कर्मचारियों की चिंता और सरकार का जवाब
IDBI बैंक के निजीकरण को लेकर बैंक कर्मचारियों के बीच भी चिंता है। कर्मचारी संगठनों की आशंकाओं में नौकरी की सुरक्षा, आरक्षण, पेंशन और सेवा शर्तों जैसे मुद्दे शामिल हैं। वहीं, सरकार का कहना है कि बैंक की वित्तीय स्थिति सुधारने और उसके भविष्य के विकास के लिए रणनीतिक पुनर्गठन जरूरी है। वित्त मंत्रालय ने बोली प्रक्रिया और मूल्यांकन को सही बताते हुए कहा है कि सरकार और LIC के पास बची हिस्सेदारी से उन्हें भविष्य में बैंक के विकास का लाभ भी मिल सकता है। इस पूरे मामले में एक तरफ सरकार बैंक के पुनर्गठन और बिक्री को आर्थिक सुधार का हिस्सा बता रही है, वहीं कांग्रेस और बैंक कर्मचारी संगठन इसके संभावित असर पर सवाल उठा रहे हैं।

