Last Updated: October 10, 2026

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Places Of Worship Act : क्या है प्लेसेस ऑफ वर्शप एक्ट ? जिसपर टिकी हैं सबकी नजर …

December 12, 2024

Places Of Worship Act : क्या है प्लेसेस ऑफ वर्शप एक्ट ? जिसपर टिकी हैं सबकी नजर …

Places of Worship Act ; नई दिल्ली :  देश में प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट (Places of Worship Act, 1991) को लेकर कई चर्चाएं हो रही हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी इस पर बहस जारी है। यह कानून धार्मिक स्थलों से संबंधित विवादों को सुलझाने के उद्देश्य से लाया गया था। आज हम जानेंगे कि प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट क्या है, इसके प्रावधान क्या हैं, और इसके पीछे का मकसद क्या था। आइए जानते है विस्तार से…

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट (Places of Worship Act), 1991 एक भारतीय क़ानून है, जिसे 1991 में भारत सरकार ने पास किया था। इस कानून का मुख्य उद्देश्य धार्मिक स्थलों के संबंध में विवादों को सुलझाना और विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच सौहार्द बनाए रखना है। यह क़ानून खासतौर पर उन स्थानों के लिए है, जिनके बारे में ऐतिहासिक और धार्मिक दावे किए जाते हैं।

प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट के प्रमुख प्रावधान:

15 अगस्त 1947 की स्थिति पर ध्यान केंद्रित

इस कानून का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि भारत में 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल थे, उनका धार्मिक रूप उस दिन जैसा रहेगा। इसका मतलब यह है कि 15 अगस्त 1947 के बाद किसी भी धार्मिक स्थल पर किसी अन्य धर्म का दावा नहीं किया जा सकता। इस दिन के बाद किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप में बदलाव या उसे दूसरे धर्म के उपयोग के लिए नहीं बदला जा सकता।

स्वरूप में बदलाव पर रोक

यह कानून यह स्पष्ट करता है कि किसी धार्मिक स्थल के स्वरूप में बदलाव की कोई भी याचिका कोर्ट में नहीं दायर की जा सकती। इसके तहत यह भी तय किया गया है कि किसी स्थान पर धार्मिक गतिविधियों को बदलने की कोशिश नहीं की जा सकती, चाहे वह मंदिर हो, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा या कोई अन्य धार्मिक स्थल हो।

धार्मिक विवादों को हल करने का उद्देश्य

इस कानून का उद्देश्य भारत में धार्मिक विवादों को हल करना और किसी भी धार्मिक स्थल पर होने वाले विवादों से बचाव करना है। यह खासकर उन विवादों से जुड़ा हुआ है, जिनमें किसी धार्मिक स्थल पर स्वामित्व और स्थल के धार्मिक स्वरूप को लेकर विवाद उठते हैं।

खास धार्मिक स्थलों का उल्लेख

इस कानून में कुछ विशेष धार्मिक स्थलों का उल्लेख किया गया है, जो ऐतिहासिक रूप से विवादित रहे हैं। उदाहरण के लिए, ज्ञानवापी मस्जिद (वाराणसी), शाही ईदगाह मस्जिद (मथुरा), राम जन्मभूमि (अयोध्या) जैसी जगहों पर ऐतिहासिक विवाद रहे हैं, और यह कानून इन स्थलों के धार्मिक स्वरूप को संरक्षित रखने का प्रयास करता है।

प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट की प्रमुख धाराएं:

धारा- 4 (1): धार्मिक स्थलों का स्वरूप बनाए रखना

धारा 4(1) के अनुसार, 15 अगस्त 1947 को एक पूजा स्थल का जो धार्मिक स्वरूप था, उसे वैसा का वैसा बनाए रखा जाएगा। इसका मतलब यह है कि किसी धार्मिक स्थल का रूप बदलने की कोशिश या उस पर कोई दावा करने का प्रयास नहीं किया जा सकता। उदाहरण के लिए, अगर किसी मस्जिद, मंदिर या चर्च का रूप 15 अगस्त 1947 तक जैसा था, तो अब उसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।

धारा- 4 (2): लंबित मुकदमे और कानूनी कार्यवाहियों पर रोक

धारा 4(2) कहती है कि इस कानून के लागू होने के बाद उन सभी मुकदमों और कानूनी कार्यवाहियों को रोका जाएगा जो पहले से चल रहे थे और जो धार्मिक स्थल के रूप को बदलने से संबंधित थे। इसका उद्देश्य यह था कि किसी भी धार्मिक स्थल पर कोई नई कानूनी कार्यवाही न हो, जो उसके धार्मिक स्वरूप को बदलने की कोशिश करे।

धारा- 5: रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले से संबंधित प्रावधान

धारा 5 यह कहती है कि यह एक्ट रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद या इससे संबंधित किसी मुकदमे, अपील या कार्यवाही पर लागू नहीं होगा। इसका मतलब यह है कि बाबरी मस्जिद और रामजन्मभूमि मामले से जुड़े फैसलों पर इस कानून का कोई असर नहीं होगा। इसे विशेष रूप से बाबरी मस्जिद के विवाद से बाहर रखा गया है।

प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट के पीछे का उद्देश्य

1991 का पूजा स्थल कानून उस समय की तत्कालीन सरकार, नरसिम्हा राव सरकार, द्वारा लाया गया था, जब राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था। यह आंदोलन न केवल अयोध्या में, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी धार्मिक विवादों का कारण बन रहा था। इस कानून को लागू करने का मुख्य उद्देश्य यह था कि देश में धार्मिक सद्भाव और सांप्रदायिक शांति बनी रहे। विशेषकर जब विभिन्न धार्मिक स्थलों पर अधिकारों को लेकर विवाद उत्पन्न हो रहे थे, तो यह कानून उन विवादों को समाप्त करने का प्रयास था। इसके जरिए सरकार ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि कोई भी धार्मिक स्थल, चाहे वह मस्जिद हो, मंदिर हो, या चर्च, उनका रूप 1947 से पहले जैसा ही रहे।

प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट का उल्लंघन और सजा:

प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट सभी के लिए समान रूप से लागू होता है। यदि कोई व्यक्ति या संस्था इस एक्ट का उल्लंघन करता है, तो उस पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उल्लंघन करने पर 3 साल तक की सजा और फाइन का प्रावधान है। इसका मतलब है कि अगर कोई व्यक्ति किसी पूजा स्थल का धार्मिक स्वरूप बदलने की कोशिश करता है, तो उसे सजा का सामना करना पड़ेगा।

प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 भारत के धार्मिक और सांप्रदायिक माहौल को संतुलित रखने के लिए एक महत्वपूर्ण कानून है। यह कानून यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी धार्मिक स्थल का धार्मिक स्वरूप 1947 के बाद से नहीं बदला जा सकता। हालांकि, यह कानून विवादों और मुद्दों का समाधान नहीं करता, लेकिन यह उन विवादों को खत्म करने की दिशा में एक कदम है। इस एक्ट की मदद से सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि धार्मिक स्थलों पर कोई भी विवाद सांप्रदायिक तनाव का कारण न बने और धार्मिक स्थलों का महत्व और पहचान बरकरार रहे।

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