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रेयर अर्थ मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग को बड़ा बढ़ावा, कैबिनेट ने 7,280 करोड़ रुपये की स्कीम को मंजूरी दी

नई दिल्ली: भारत को रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) बनाने में आत्मनिर्भर बनाने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ी योजना को मंजूरी दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में 7,280 करोड़ रुपये की लागत वाली “सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की स्कीम” को हरी झंडी दे दी गई।

क्या है इस योजना का उद्देश्य?
इस स्कीम का मकसद देश में हर साल 6,000 मीट्रिक टन (MTPA) रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट बनाने की क्षमता को विकसित करना है। ये मैग्नेट बेहद शक्तिशाली होते हैं और इनका उपयोग कई महत्वपूर्ण सेक्टरों में होता है, जैसे कि इलेक्ट्रिक गाड़ियां, सोलर और विंड एनर्जी, मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज़ और एयरोस्पेस और रक्षा उपकरण। अभी भारत इन मैग्नेट के लिए बड़े पैमाने पर चीन पर निर्भर है। इस स्कीम से यह निर्भरता कम होगी और देश अपनी खुद की मैग्नेट सप्लाई चेन विकसित कर सकेगा।

योजना में क्या-क्या मिलेगा?
कुल लागत 7,280 करोड़ रुपये। इसमें दो बड़े हिस्से शामिल हैं, जिनमें पहला हिस्सा 6,450 करोड़ रुपये – सेल्स-लिंक्ड इंसेंटिव … यह राशि कंपनियों को उनकी मैग्नेट बिक्री के आधार पर 5 साल तक दी जाएगी। दूसरा हिस्सा 750 करोड़ रुपये – कैपिटल सब्सिडी, यह रकम मैग्नेट बनाने की फैक्ट्री लगाने के लिए दी जाएगी।

स्कीम की अवधि और प्रक्रिया
स्कीम की कुल अवधि 7 साल होगी। पहले 2 साल फैक्ट्री लगाने और उत्पादन शुरू करने में लगेंगे। अगले 5 साल उत्पादन पर इंसेंटिव दिए जाएंगे। सरकार ग्लोबल कॉम्पिटिटिव बिडिंग के जरिए कुल 5 कंपनियों का चयन करेगी। हर कंपनी को अधिकतम 1,200 MTPA तक की क्षमता दी जाएगी।

स्कीम से कैसे बदलेगी तस्वीर?
देश में पहली बार पूरी तरह इंटीग्रेटेड REPM मैन्युफैक्चरिंग होगी यानी कि रेयर अर्थ ऑक्साइड- मेटल- एलॉय- फिनिश्ड मैग्नेट सब एक ही जगह बनाया जाएगा। इससे भारत का मैग्नेट उत्पादन खुद के दम पर खड़ा होगा। इंडस्ट्री को भरोसेमंद घरेलू सप्लाई मिलेगी। भारत के नेट जीरो 2070 लक्ष्य को भी मदद मिलेगी। 2047 में विकसित भारत के विज़न के तहत हाई-टेक और टिकाऊ उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा।

कुल मिलाकर
यह स्कीम भारत को रेयर अर्थ मैग्नेट के वैश्विक बाज़ार में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनाने की दिशा में बहुत बड़ा कदम है। इससे देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और भविष्य की इलेक्ट्रिक तथा ग्रीन एनर्जी इंडस्ट्री को नई ताकत मिलेगी।

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