इंटरनेशनल डेस्क: स्पेसएक्स ड्रैगन अंतरिक्ष यान ‘ग्रेस’ तेजी से धरती की ओर लौट रहा है। यह यान भारतीय यात्री शुभांशु शुक्ला और 3 अन्य यात्रियों को लेकर स्पेस में गया था। बताया जा रहा है कि ये यान 14 जुलाई को शाम 4.35 बजे (भारतीय समयानुसार) अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के हार्मनी मॉड्यूल से अनडॉक हो चुका है। ग्रेस मंगलवार को यूएस के दक्षिणी कैलिफोर्निया के तट के पास प्रशांत महासागर में स्प्लैशडाउन करेगा। इसकी लैंडिंग के तुरंत बाद रिकवरी जहाज पहुंच जाएगा।
इसके बाद चालक दल की हेल्थ मॉनिटरिंग होगी और बाद में उनको ह्यूस्टन भेजा जाएगा। बताया जा रहा है कि चारों यात्रियों को लगभग 10 दिन तक रिहेब और क्वारंटीन किया जाएगा। स्प्लैशडाउन का मतलब पानी में लैंडिंग से होता है। अब सवाल ये उठता है कि अंतरिक्ष से लौटे यात्रियों को आखिर समंदर में ही क्यों उतारा जाता है? इसके पीछे क्या लॉजिक है, इसके बारे में जानते हैं?
Shubhanshu Shukla to touch down on Earth today with splashdown off California coast
•Group Captain Shubhanshu Shukla, the first Indian to reach the International Space Station (ISS), is set to return to Earth on Tuesday, marking the end of a historic mission under Axiom Space’s… pic.twitter.com/TTHuwLWK0i
— IANS (@ians_india) July 15, 2025
एरोब्रेकिंग तकनीक का प्रयोग
पैराशूट की मदद से जब विमान को पानी में लैंड करवाते हैं तो इस प्रक्रिया को स्प्लैशडाउन कहते हैं। स्पेशक्राफ्ट हजारों किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से पृथ्वी के वायुमंडल में एंट्री करता है। फ्रिक्शन की वजह से ज्यादा गर्मी होती है, इससे स्पेसक्राफ्ट को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे में स्पीड घटाने के लिए पैराशूट यूज होता है। कैप्सूल जब समंदर में गिरता है तो इसकी स्पीड लगभग 15-20 मील तक कम होती है। इस तकनीक को एरोब्रेकिंग कहते हैं, जो नासा ने ईजाद की थी।
यात्रियों को कम नुकसान
स्पेसक्राफ्ट को हीट शील्ड से सुरक्षित करने के लिए भी पानी का प्रयोग होता है। दूसरा स्पेशक्राफ्ट जब पानी में उतरता है तो उसे जमीन के बजाय कम झटका लगता है। इससे यान और यात्रियों को कम नुकसान होता है। जमीन पर पहाड़ आदि की वजह से भी दुर्घटना हो सकती है। इसकी तुलना में पानी की सतह सुरक्षित मानी जाती है।
कई दफा स्प्लैशडाउन से नुकसान भी हो जाते हैं। कई बार देखने में आया है कि यात्री तय लैंडिंग से काफी आगे निकल जाते हैं। उनके डूबने का खतरा भी रहता है। कैप्सूलों को सुरक्षित रखने के लिए नौसेनाओं को भी काफी प्रयास करने पड़ते हैं। कई बार हैच रहस्यमय तरीके से पहले भी फट जाता है।

