मुंबई: मुंबई BMC (बृहन्मुंबई महानगरपालिका) के मेयर पद का फैसला अब तय हो गया है। गुरुवार को इस पद के लिए लॉटरी निकाली गई, जिसमें मेयर पद सामान्य श्रेणी की महिला के लिए आरक्षित हुआ। नवी मुंबई, पुणे और नाशिक नगर निगम में भी लॉटरी के बाद महिला के खाते में मेयर पद गया है।
हर बार मेयर चुनाव के बाद आरक्षण प्रणाली के अनुसार यह तय होता है कि पद किस वर्ग के लिए होगा, एससी-एसटी, महिला, ओबीसी या कोई अन्य वर्ग। इस बार बीजेपी और शिवसेना (शिंदे गुट) ने 118 सीटों पर जीत हासिल की, लेकिन उनके बीच कोई एससी वर्ग का उम्मीदवार नहीं था। वहीं, उद्धव ठाकरे गुट से एससी वर्ग का पार्षद जीता था।
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महिला मेयर का महत्व
मुंबई, पुणे, नागपुर और नाशिक महानगरपालिकाओं में अब महिलाओं के हाथ में कमान होगी। यह फैसला महाराष्ट्र की राजनीति में खास महत्व रखता है। मुंबई BMC, देश की सबसे अमीर महानगरपालिका है और सामान्य श्रेणी (महिला) के लिए आरक्षित होने से अब जातिगत समीकरण का बंधन खत्म हो गया है। इसका मतलब है कि पार्टियाँ किसी खास जाति या वर्ग की महिला तलाशने की मजबूरी से आजाद हैं और अब सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय महिला पार्षद को सीधे मैदान में उतारा जा सकता है।
BMC पर सियासी असर
BMC पिछले 30 सालों से शिवसेना का मजबूत किला रही है। सामान्य श्रेणी महिला होने के कारण अब बीजेपी और शिवसेना (शिंदे गुट) किसी ऐसी महिला उम्मीदवार पर दांव लगा सकते हैं, जिसकी मुंबई में सबसे मजबूत पकड़ हो।
अब क्या होगा?
निर्धारित तारीख पर उम्मीदवार अपना पर्चा भरेंगे। मेयर का चुनाव जनता नहीं, बल्कि चुने हुए पार्षद करेंगे। सदन की विशेष बैठक में पीठासीन अधिकारी की मौजूदगी में वोटिंग होगी। पार्टी व्हिप जारी करेगी और अगर कोई पार्षद पार्टी लाइन के खिलाफ वोट देता है, तो उसकी सदस्यता रद्द हो सकती है। बहुमत वाले गठबंधन के हिसाब से मेयर चुना जाएगा। सामान्य श्रेणी (महिला) होने की वजह से अब चयन पूरी तरह पार्टी की रणनीति, फ्लोर मैनेजमेंट और उम्मीदवार की लोकप्रियता पर टिका होगा।
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