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संघर्ष से शिखर तक : Mamata Banerjee के जीवन के 7 अहम पड़ाव

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जालंधर। भारतीय राजनीति में तूफानी चिड़िया कही जाने वाली ममता बनर्जी अचानक राजनीति पर हावी हो गई हो ऐसा भी नहीं है। किसी भी प्रदेश में लगातार तीन बार सीएम बन जाना अपने आप में खास है। यदि ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन पर एक नजर डालें तो पाएंगे कि उनके जीवन में कई पड़ाव आए जिन्हें पार करते हुए वे महान राजनीतिज्ञ बन गईं। आईये नजर डालते हैं इन मौकों पर।

10 बार के सांसद को हराया

ये बात है तब की जब ममता दीदी मात्र 29 वर्ष की थीं। इस समय वे कांग्रेस की युवा नेत्री थीं।
तब 1984 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने जादवपुर से सीपीएम के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को हराया। उन्होंने सहानुभूति की लहर का फायदा उठाते हुए कांग्रेस को 400 सीटों का आंकड़ा पार कराया। इस बार सोमनाथ चटर्जी पहली बार चुनाव हारे थे। वे 10 बार सांसद रह चुके थे। इसके बाद उन्होंने अपना निर्वाचन क्षेत्र बदलकर लोकसभा में वापसी की।

सिर फुड़वाकर बन गई राष्ट्रीय नेता

ये समय था 16 अगस्त 1990 का। जब ममता बनर्जी जो उस समय भी युवा कांग्रेस से जुड़ी थीं, पर दक्षिण कोलकाता के हाजरा क्रॉसिंग पर वामपंथी विचारधारा से जुड़े गुंडों ने हमला कर दिया। सिर पर रॉड से वार किए जाने से उनकी सिर में फ्रैक्चर आ गया और गंभीर रक्तस्राव हुआ, जिसके चलते उन्हें एक महीने तक अस्पताल में रहना पड़ा। अस्पताल के बिस्तर पर पट्टियों से लिपटी ममता की तस्वीर ने उनकी स्ट्रीट फाइटर वाली छवि को और मजबूत कर दिया और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि दिलाई।

संसद में बंडल फेंका और दे दिया इस्तीफा

ये मौका है अगस्त 2005 का। इस बार ममता बनर्जी जो उस समय तृणमूल की एकमात्र सांसद थीं, ने पश्चिम बंगाल में अवैध बांग्लादेशी अप्रवासन का मुद्दा उठाने का मौका नहीं मिलने पर लोकसभा में अध्यक्ष की ओर कागजों का एक बंडल फेंक दिया। इसके बाद उन्होेंने नैतिकता का परिचय दिया और अपना इस्तीफा सौंप दिया, लेकिन अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने इसे अस्वीकार कर दिया।

इस आंदोलन से पहुंची सत्ता तक

इन आंदोलनों ने ममता बनर्जी के सत्ता तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त किया। पहले दो आंदोलन सिंगूर और नंदीग्राम, वामपंथी सरकार की भूमि अधिग्रहण नीतियों के विरोध में थे। जबकि लालगढ़ विरोध प्रदर्शनों में पुलिस की ज्यादतियों को निशाना बनाया था। सिंगूर आंदोलन के दौरान ममता की 26 दिनों की भूख हड़ताल एक निर्णायक मोड़ साबित हुई, जिससे “मां, मातृभूमि और जन” का नारा प्रचलित हुआ।

खत्म किया था 34 सालों के वामपंथी शासन

ये बात है वर्ष 2011 की जब विधानसभा चुनावों में टीएमसी और उसके सहयोगियों ने 294 में से 227 सीटें जीतकर पश्चिम बंगाल में 34 वर्षों के वामपंथी शासन का अंत कर दिया। वामपंथी दल को 62 सीटें मिलीं, जो 1977 के बाद से उसकी सबसे कम संख्या थी, जिसके चलते कोलकाता में अभूतपूर्व जश्न का माहौल था।

ऐसे शुरू हुआ खेला होबे का नारा

उनके एक दशक के शासन के बाद राजनीति में बड़ा फेरबदल हुआ और भाजपा प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरी। नंदीग्राम में ममता बनर्जी का मुकाबला भगवा नेता सुवेंदु अधिकारी और उनके पूर्व सहयोगी से कड़ा चुनावी था, जहां उनका एक दुर्घटना में पैर टूट गया। व्हीलचेयर पर बैठी और पट्टी बंधे पैर के साथ ममता बनर्जी के लगाए गए खेला होबे ​​के नारे ने 2021 के चुनाव में टीएमसी को 213 सीटों और 48% वोटों के साथ शानदार जीत दिलाई।

ममता ने ऐसे की दोहरी ब्रांडिंग

एक और विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देते हुए ममता बनर्जी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के साथ पोस्टरों में समान स्थान साझा कर रही हैं। यह तस्वीर दोहरे नेतृत्व का दृश्य चित्रण प्रस्तुत करती है। पोस्टरों में ममता को सर्वाधिनायक के रूप में दर्शाया गया है, जबकि अभिषेक को “ओधिनायक” कहा गया है।

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