Abhishek Banerjee Trinamool Congress’s future or villain कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में यदि एक नेता पर बात हो तो वे हैं अभिषेक बनर्जी। वे ममता बनर्जी के भतीजे हैं और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव। सियासती भाषा में उन्हें उत्तराधिकारी माना जाता है, जबकि आलोचक उन्हें पार्टी की मुश्किलों और विवादों का केंद्र बताते हैं। यही कारण है कि बंगाल की राजनीति में उनका व्यक्तित्व ‘युवराज’ और ‘खलनायक’ की दो विरोधी छवियों के बीच झूलता नजर आता है।
अभिषेक बनर्जी ने युवा नेता के रूप में तृणमूल कांग्रेस में अपनी पहचान बनाई। 2011 में युवा तृणमूल कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने संगठन में नई पीढ़ी को जोड़ने का प्रयास किया। 2014 से लगातार लोकसभा चुनाव जीतते हुए वे पार्टी के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल हो गए। 2021 में उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया, जिसे ममता बनर्जी के बाद पार्टी में सबसे महत्वपूर्ण पद माना गया। समर्थकों का मानना है कि अभिषेक ने तृणमूल को आधुनिक राजनीतिक शैली, डिजिटल प्रचार और युवा नेतृत्व की दिशा दी। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी वे पार्टी के प्रमुख रणनीतिक चेहरों में शामिल रहे।
विपक्ष और पार्टी के भीतर कुछ असंतुष्ट नेताओं का आरोप है कि अभिषेक के नेतृत्व में निर्णय प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत हो गई। हाल के राजनीतिक संकट में कई नेताओं ने अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। कुछ नेताओं ने दावा किया कि पार्टी में उनकी बढ़ती शक्ति से असंतोष पैदा हुआ। इसके अलावा विभिन्न जांच एजेंसियों और हालिया CID पूछताछ ने भी उनके राजनीतिक विरोधियों को हमला करने का अवसर दिया है। हाल के दिनों में उन्हें कई मामलों में पूछताछ का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी छवि पर राजनीतिक बहस तेज हुई है।
राजनीतिक गलियारों में ये माना जा रहा है कि पार्टी का ममता बनर्जी के हाथ से जाना तय है, मगर क्या अलग स्वरूप में पार्टी अस्तित्व बचा पाएगी? विधानसभा के बाद लोकसभा में पार्टी पर विरोधी गुट के दावे, अभिषेक बनर्जी के बहाने अब कभी ममता के खासमखास रहे वरिष्ठ नेताओं का नया मोर्चा और पार्टी के कांग्रेस में विलय की चर्चाओं के बीच सियासी गलियारे में पार्टी के अस्तित्व को ले कर एक साथ कई यक्ष प्रश्न खड़े हो गए हैं। सियासत में संघर्ष के कारण अलग और मुखर पहचान रखने वाली ममता की चुप्पी पार्टी के भविष्य को लेकर कयासों को मजबूत जमीनी आधार मुहैया करा रहा है।
अभिषेक को लेकर ही ममता के करीबी भी नाराज हैं। ममता के अंधे लगाव पर पहले सांसद, विधायक दबी जुबान चर्चा करते थे, अब यह सार्वजनिक हो गया है। असली टीएमसी पर दावे के बीच एक अजीब सा विरोधाभाष भी बन रहा है जो भाजपा को असहज करेगा। मसलन विरोधी धड़ा राज्य में मुख्य विपक्षी दल होगा, जबकि केंद्र में इस धड़े ने मोदी सरकार को समर्थन देने की घोषणा की है। ममता के बेहद करीबी नेता ने कहा कि नतीजे आने के बाद सभी को उम्मीद थी कि वह पहले की तरह खुल कर मोर्चा संभालेंगी। इसकी जगह जब यह सूचना आई कि वह पार्टी का कांग्रेस में विलय के प्रस्ताव पर विचार कर रही हैं तो बाकी बचे लोगों का भी आत्मविश्वास हिल गया। इन्हें लगता है कि विलय की स्थिति में सिर्फ ममता और अभिषेक का ही भविष्य बचेगा।
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