
Anil Vij opposes electricity privatization : अंबाला। प्रदेश के गुरुग्राम और नूंह की बिजली वितरण व्यवस्था के निजीकरण के लिए सियासी और प्रशासनिक मोर्चे पर विरोध तेज हो गया है। कर्मचारी संगठनों के बाद अब ऊर्जा मंत्री अनिल विज और खुद दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम (DHBVN) भी इस प्रस्ताव के खिलाफ खुलकर सामने आ गए हैं।
ऐसे में बिजली वितरण के निजीकरण का मुद्दा सरकार के लिए नई चुनौती बनता नजर आ रहा है। बता दें कि सरकार फिलहाल गुरुग्राम और नूंह को पहले चरण में निजी कंपनी को सौंपने की तैयारी में है। यदि यह मॉडल लागू होता है तो दूसरे चरण में पंचकूला और फरीदाबाद को भी शामिल किया जा सकता है। हालांकि, इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है।
विभाग के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि गुरुग्राम और नूंह में कार्यरत नियमित और अनुबंधित कर्मचारियों का भविष्य क्या होगा। निजीकरण के बाद उनकी नौकरी और समायोजन को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट नीति नहीं बताई गई है।
गुरुग्राम और नूंह दक्षिण हरियाणा बिजली निगम के सबसे ज्यादा कमाई वाले जिले हैं। इन दोनों जिलों से निगम को हर महीने करीब 777 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता है। विभाग का कहना है कि अगर ये जिले निजी कंपनी को दे दिए गए, तो निगम की आय घट जाएगी। इससे दूसरे जिलों में बिजली व्यवस्था और निगम की आर्थिक स्थिति पर भी असर पड़ सकता है।
यह सिर्फ शुरुआत है। गुरुग्राम और नूंह के बाद दूसरे चरण में पंचकूला और फरीदाबाद में भी बिजली वितरण का निजीकरण किया जा सकता है। कर्मचारी संगठनों का मानना है कि यह पूरे हरियाणा में बिजली व्यवस्था के निजीकरण की शुरुआत है।
विभाग ने HERC से कहा कि निजीकरण का मकसद सिर्फ कमाई बढ़ाना नहीं होना चाहिए। इससे उपभोक्ताओं को मिलने वाली सेवाओं, शिकायतों के समाधान और बिजली के बिलों पर क्या असर पड़ेगा, इसका भी पूरी तरह आकलन किया जाना चाहिए।
इस संबंध में अनिल विज ने कहा कि बिजली जैसी आवश्यक सेवा में जल्दबाजी ठीक नहीं। कर्मचारियों और उपभोक्ताओं के हित सर्वोपरि होने चाहिए। किसी भी फैसले से पहले सभी पक्षों की राय जरूरी।सरकार को सभी पहलुओं पर विचार करना चाहिए। गुरुग्राम और नूंह की बिजली वितरण व्यवस्था निजी कंपनी को सौंपने के प्रस्ताव पर फिलहाल कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग (HERC) ने मामले की गहन जांच के लिए तीन सदस्यीय स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित की है। समिति 13 जुलाई से काम शुरू करेगी और 15 दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट आयोग को सौंपेगी।
आयोग ने यह अंतरिम आदेश गुरुवार को जारी किया। इससे पहले 8 जुलाई को हुई जनसुनवाई में निजी कंपनी, बिजली निगमों, कर्मचारी संगठनों, किसान संगठनों, उपभोक्ता प्रतिनिधियों और अन्य पक्षों की दलीलें सुनी गई थीं। सुनवाई पूरी होने के बाद आयोग ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। समिति के अध्यक्ष सेवानिवृत्त IAS अधिकारी आलोक निगम होंगे। उनके साथ बिजली क्षेत्र के विशेषज्ञ ई. रविंदर कुमार शर्मा और वित्त विशेषज्ञ बिभू प्रसाद महापात्र सदस्य होंगे। आयोग ने कहा कि बिजली क्षेत्र पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभाव, उपभोक्ताओं के हित, वित्तीय, तकनीकी और कानूनी पहलुओं की स्वतंत्र समीक्षा जरूरी है, इसलिए विशेषज्ञ समिति बनाई गई है।
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