Last Updated: October 7, 2026

Dainik Savera Times Logo

अनुच्छेद 370 मामले को संविधान की भावनात्मक बहुसंख्यकवादी व्याख्या तक सीमित नहीं किया जा सकता

September 6, 2023

अनुच्छेद 370 मामले को संविधान की भावनात्मक बहुसंख्यकवादी व्याख्या तक सीमित नहीं किया जा सकता

नई दिल्ली: वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने सोमवार को अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई कर रही संविधान पीठ के समक्ष अपने जवाबी तर्क में दलील दी कि संविधान की ‘भावनात्मक बहुसंख्यकवादी व्याख्या‘ नहीं हो सकती और इस मामले में समीक्षा की जरूरत है। व्याख्या ‘पाठ पढ़ें, संदर्भ समझें और अनुच्छेद 370 की व्याख्या करें‘ पर आधारित है।

सिब्बल ने कहा, ‘जम्मू-कश्मीर के सभी निवासी भारत के नागरिक हैं। वे भी अन्य लोगों की तरह ही भारत का हिस्सा हैं। यदि ऐतिहासिक रूप से संविधान का एक अनुच्छेद है जो उन्हें अधिकार देता है, तो वे कानून के मामले में इसकी रक्षा करने के हकदार हैं।‘उन्होंने तर्क दिया कि भारत में किसी भी अन्य रियासत की तरह जम्मू-कश्मीर का संविधान 1950 के बाद तैयार नहीं किया गया था।पहले की सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए तर्क पर सवाल उठाया था कि जम्मू-कश्मीर एकमात्र राज्य था, जिसके पास 1939 में अपना संविधान था और इसलिए, उसे विशेष उपचार मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यह तर्क ‘तथ्यात्मक रूप से अच्छी तरह से स्थापित नहीं है‘ और 62 राज्य ऐसे थे जिनके अपने संविधान थे – चाहे उन्हें संविधान के रूप में नामित किया गया हो या आंतरिक शासन के साधन के रूप में।1930 के दशक के अंत में अन्य 286 राज्य अपने संविधान बनाने की प्रक्रिया में थे।इससे पहले दिन में, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 370 संविधान का एकमात्र प्रावधान है जिसमें आत्म-विनाश तंत्र है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 को जारी रखना बुनियादी ढांचे के सिद्धांत का विरोध करता है।उन्होंने संविधान पीठ के समक्ष तर्क दिया कि अनुच्छेद 370 के तहत राष्ट्रपति की शक्तियां प्रकृति में ‘पूर्ण‘ हैं और ऐसी असाधारण शक्तियों को किसी भी सीमा के साथ नहीं पढ़ा जाना चाहिए।

हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने संविधान की प्रस्तावना का हवाला दिया और कहा कि जम्मू-कश्मीर के संविधान में ‘संप्रभु‘ शब्द शामिल नहीं है, जो राज्य पर संघ की संप्रभुता को दर्शाता है।उन्होंने तर्क दिया कि अंतिम कानूनी संप्रभुता भारत संघ के पास है, उन्होंने कहा कि शुरुआत से ही राष्ट्रपति द्वारा जारी किए गए सभी संवैधानिक आदेशों में ‘संविधान सभा‘ और ‘विधान सभा‘ शब्द का परस्पर उपयोग किया गया था।

इस बीच सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली संविधान पीठ ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मोहम्मद अकबर लोन से, जो अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के खिलाफ दायर याचिकाओं के समूह में मुख्य याचिकाकर्ताओं में से एक हैं और कथित तौर पर राज्य विधानसभा में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद‘ के नारे लगाए थे, एक हलफनामा दाखिल करने को कहा। संक्षिप्त हलफनामा यह पुष्टि करता हो कि जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और वह संविधान का पालन करता है और उसके प्रति निष्ठा रखता है।

5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ में न्यायमूर्त िसंजय किशन कौल, न्यायमूर्त िसंजीव खन्ना, न्यायमूर्त िबी.आर. गवई और सूर्यकांत भी शामिल हैं। संविधान पीठ पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य को दिए गए विशेष दर्जे को छीनने और इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने वाले 2019 के राष्ट्रपति आदेश को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।

खबरें और भी हैं...

Copyright © 2025 Dainik Savera Times. All rights reserved.
ऐप खोलें