बैसाखी एक त्योहार नहीं अपितू देश की समृद्ध संस्कृति, किसानों की मेहनत, फसल के लिए ईश्वर के धन्यवााद और आस्था के प्रतीक का दिन है। यह पर्व हर साल अप्रैल में मनाया जाता है। पंजाब के मुख्य माना जाने वाला यह पर्व हरियाणा, पंजाब, जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में श्रद्धा से मनाया जाता है। इस वर्ष यह दिन 14 अप्रैल मंगलवार को मनाया जाएगा। Baisakhi is a festival of faith
यहां बात करते हैं बैसाखी के अलग-अलग रूपों की। पंजाब में इस दिन बड़ा और मुख्य उत्सव होता है। खालसा पंथ का स्थापना दिवस होने के कारण यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। हरियाणा में यह किसानों के लिए फसल कटाई का त्योहार है। इस दिन मेलों और लोकनृत्य (भांगड़ा-गिद्धा) का आयोजन होता है। हिमाचल प्रदेश में भी इसे कृषि पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा और मेले लगते हैं। जम्मू और कश्मीर में खासकर जम्मू क्षेत्र में बैसाखी का ज्यादा अधिक है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और मेले लगते हैं। उत्तराखंड में इसे बिखौती या संक्रांति के रूप में मनाते हैं। जबकि उत्तर प्रदेश कुछ क्षेत्रों में धार्मिक रूप से मनाया जाता है। हरियाणा और पंजाब में बैसाखी पर्व पर खेतों में गेहूं की फसल पककर तैयार होती है। (Baisakhi is a festival of faith) इससे किसानों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। यह पर्व इसी मेहनत के फल का जश्न है और इस फसल के लिए ईश्वर के धन्यवाद का दिन है। किसान इस फसल के लिए आने वाले समय के लिए प्रार्थना करते हैं। यह दिन किसानों के लिए नई उम्मीद और खुशहाली का संदेश लेकर आता है।
हरियाणा में फसल के लिए ईश्वर के धन्यवाद का दिन है तो पंजाब में इसका धार्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। सिखों के गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की थी, जिसने समाज में समानता, साहस और धर्म की रक्षा का संदेश दिया। यह दिन सिख समुदाय के लिए गर्व और प्रेरणा का स्रोत है। बैसाखी आते ही गांवों और शहरों में उत्सव का माहौल बन जाता है। ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा, मेलों की रौनक होती है। इस दिन गुरुद्वारों में कीर्तन और लंगर का आयोजन लोगों को एकता और सेवा का संदेश देता है।
बैसाखी को पंजाबी नववर्ष की शुरुआत भी माना जाता है। यह हमें सिखाती है कि पुराने दुखों को पीछे छोड़कर नई ऊर्जा और उम्मीद के साथ आगे बढ़ना चाहिए। सबसे प्रसिद्ध कथा सिख धर्म से जुड़ी है। बैसाखी पर्व की बात करें और इस तथ्य का जिक्र न हो, ये नहीं हो सकता। इस दिन 1699 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में एक सभा का आयोजन किया। उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए बलिदान मांगते हुए पांच लोगों को आगे आने के लिए कहा। ये पांच लोग पंज प्यारे कहलाए। इसके बाद गुरु जी ने खालसा पंथ की स्थापना की। यह घटना साहस, समानता और धर्म की रक्षा का प्रतीक बन गई।
कहा जाता है कि बैसाखी के समय धरती माता अपने सबसे सुंदर रूप में होती हैं। किसान इसे प्रकृति का आशीर्वाद मानते हैं। अच्छी फसल आने पर लोग भगवान का धन्यवाद करते हैं। यह कहानी मेहनत और प्रकृति के सम्मान का संदेश देती है। कुल मिलाकर ये त्योहार हरियाणा और पंजाब में विशेष रूप से मनाया जाता है। इसके अलावा अन्य प्रदेशों में भी ये पर्व मनाया जाता है। केवल नाम का अंतर होता है।
बैसाखी के पावन दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता ने इंसानियत को झकझोर दिया। इतिहासकार मानते हैं कि जलियांवाला बाग हत्याकांड भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। हजारों लोग 13 अप्रैल 1919 को शांतिपूर्वक सभा कर रहे थे, तभी ब्रिटिश अधिकारी जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के सैनिकों को गोली चलाने का आदेश दे दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बाग के संकरे रास्तों को बंद कर दिया गया था, जिससे लोग भाग नहीं सके। करीब 10 मिनट तक लगातार गोलियां चलाई गईं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक सैकड़ों लोग मारे गए, जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक मानी जाती है।
हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के साथ-साथ अन्य प्रदेशों में मान्यता है कि बैसाखी के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं। खासकर हरिद्वार में गंगा स्नान के लिए इस दिन भारी भीड़ होती है। लोग इसे आत्मशुद्धि और पुण्य कमाने का अवसर मानते हैं। इतना ही नहीं इस दिन जो लोग गंगा स्नान नहीं कर पाते वे पहले से घर में रखे गंगा जल को पानी में मिलाकर स्नान करते हैं अथवा घर में गंगा जल का छिड़काव भी करते हैं।
बैसाखी को नए साल की शुरुआत माना जाता है। लोग पुराने दुख भूलकर नई शुरुआत करते हैं। यह कहानी नई उम्मीद और खुशियों का प्रतीक है। कुल मिलाकर यह दिन साहस, मेहनत, आस्था और नई शुरुआत का संदेश देता हैं। इस दिन लोग सुबह-सुबह लोग गुरुद्वारों में जाते हैं। कीर्तन, अरदास और पाठ में शामिल होते हैं। भगवान का धन्यवाद करते हैं। यह पर्व हर साल 13 या 14 अप्रैल को मनाई जाती है। इस वर्ष यह दिन 14 अप्रैल मंगलवार को मनाया जाएगा।
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मेष: दिन शुभ रहेगा...