Bakrid 2026 Eid-Ul-Adha History: आज देश और दुनिया में मुस्लिम समुदाय ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का पर्व पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मना रहा है। यह इस्लाम धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक माना जाता है। इस दिन लोग सुबह विशेष नमाज़ अदा करते हैं, एक-दूसरे को गले लगाकर ईद की मुबारकबाद देते हैं और जरूरतमंदों के साथ खुशियां बांटते हैं।
ईद-उल-अजहा केवल कुर्बानी का त्योहार नहीं है, बल्कि यह इंसान के भीतर मौजूद अहंकार, लालच और स्वार्थ को त्यागने का संदेश भी देता है। इस पर्व की परंपरा हजारों साल पुरानी मानी जाती है और इसका संबंध पैगंबर हजरत इब्राहिम और उनके बेटे हजरत इस्माइल की ऐतिहासिक घटना से जुड़ा हुआ है। आइए इसके पूरे इतिहास और इससे जुड़ी कहानियों के बारे में जानते हैं…
#WATCH भोपाल, मध्य प्रदेश: ईद-उल-अज़हा 2026 के अवसर पर लोगों ने नमाज़ अदा की। pic.twitter.com/Py80riLGph
— ANI_HindiNews (@AHindinews) May 28, 2026
कैसे शुरू हुई बकरीद की परंपरा
इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेने के लिए उनसे उनकी सबसे प्रिय चीज कुर्बान करने को कहा। इब्राहिम के लिए उनके बेटे इस्माइल सबसे अधिक प्रिय थे। अल्लाह के आदेश का पालन करते हुए उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का निश्चय किया।
कहा जाता है कि जब इब्राहिम अपने बेटे को लेकर कुर्बानी के लिए निकले, तब रास्ते में शैतान ने उन्हें रोकने और बहकाने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने अपने इरादे से पीछे हटने के बजाय शैतान को ठुकरा दिया।
जब इब्राहिम ने अल्लाह की राह में अपने बेटे की कुर्बानी देने का प्रयास किया, तभी अल्लाह ने उनकी नीयत और समर्पण को स्वीकार कर लिया। इस्माइल की जगह एक दुम्बे (भेड़ या बकरा) की कुर्बानी हो गई और उनके बेटे की जान बच गई। इसी घटना की याद में हर साल मुसलमान ईद-उल-अजहा मनाते हैं।
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4000 साल पुराना माना जाता है इतिहास
वहीं इतिहासकारों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा लगभग 4000 साल पुरानी मानी जाती है। इस घटना का उल्लेख हिब्रू बाइबिल में भी मिलता है, जहां हजरत इब्राहिम को अब्राहम और उनके बेटे को इसहाक के नाम से जाना जाता है।
हालांकि ईद-उल-अजहा को संगठित रूप में मनाने की शुरुआत पैगंबर मोहम्मद साहब के दौर में मदीना से मानी जाती है। जब वे मक्का से हिजरत कर मदीना पहुंचे, तब वहां कुछ पारंपरिक त्योहार मनाए जाते थे। इसके बाद इस्लामी परंपरा के अनुसार दो प्रमुख ईदों ईद-उल-फितर और ईद-उल-अजहा को विशेष महत्व दिया गया।
बकरीद का असली संदेश
बता दें कि ईद-उल-अजहा का मूल उद्देश्य केवल पशु कुर्बानी नहीं है। यह त्योहार इंसान को यह सीख देता है कि उसे अपने अंदर की बुराइयों, अहंकार और लालच को भी त्यागना चाहिए।
इस पर्व में सामाजिक समानता और भाईचारे का संदेश भी छिपा है। कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटने की परंपरा है एक हिस्सा परिवार के लिए, दूसरा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए, जबकि तीसरा हिस्सा गरीब और जरूरतमंद लोगों को दिया जाता है। इससे समाज के हर वर्ग को त्योहार की खुशियों में शामिल होने का अवसर मिलता है।
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बकरीद पर दिनभर क्या-क्या होता है
ईद-उल-अजहा के दिन सुबह से ही घरों और मस्जिदों में रौनक दिखाई देने लगती है। लोग सुबह उठकर फज्र की नमाज़ अदा करते हैं और फिर स्नान कर नए या अपने सबसे अच्छे कपड़े पहनते हैं। इत्र की खुशबू और तकबीर की आवाज़ों के बीच लोग ईदगाह या मस्जिद की ओर रवाना होते हैं, जहां विशेष नमाज़ और खुतबा अदा किया जाता है।
नमाज़ के बाद हर तरफ भाईचारे और मोहब्बत का खूबसूरत नज़ारा देखने को मिलता है। लोग एक-दूसरे से गले मिलकर “ईद मुबारक” कहते हैं और आपसी रिश्तों में प्यार और अपनापन बढ़ाते हैं। इसके बाद धार्मिक परंपराओं के अनुसार कुर्बानी की रस्म निभाई जाती है, जो त्याग और अल्लाह के प्रति समर्पण का प्रतीक मानी जाती है।
घर लौटकर परिवार के लोग मिलकर स्वादिष्ट पारंपरिक खाना बनाते हैं। शीर-खुरमा, बिरयानी और मटन जैसे पकवानों की खुशबू से पूरा घर भर जाता है। शाम के समय लोग अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के घर ईद मिलने जाते हैं। बच्चे नए कपड़े पहनकर बहुत खुश होते हैं और बड़ों से ईदी लेने के लिए उत्साहित रहते हैं। घरों में मेहमान आते रहते हैं और हर तरफ खुशी का माहौल रहता है।
ईद-उल-अजहा केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि इंसानियत, दया, त्याग और सामाजिक एकता का संदेश देने वाला पर्व है। यह त्योहार लोगों को जरूरतमंदों की मदद करने, रिश्तों को मजबूत बनाने और समाज में प्रेम व भाईचारे को बढ़ावा देने की सीख देता है।

