नई दिल्ली: केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच ने 12 फरवरी को हड़ताल का आह्वान किया है। यूनियनों का दावा है कि इस आंदोलन में देशभर से लगभग 30 करोड़ श्रमिक भाग ले सकते हैं। संगठनों का कहना है कि यह हड़ताल श्रमिकों, किसानों और आम नागरिकों से जुड़े मुद्दों को लेकर की जा रही है।
ट्रेड यूनियन नेताओं के अनुसार, विभिन्न राज्यों और जिलों में व्यापक स्तर पर तैयारियां की गई हैं। उनका दावा है कि पिछले आंदोलनों की तुलना में इस बार अधिक जिलों में असर देखने को मिल सकता है। यूनियनों का कहना है कि जिला और ब्लॉक स्तर पर बैठकें, जनसभाएं और अभियान चलाकर लोगों को हड़ताल के उद्देश्य से अवगत कराया गया है।
किन राज्यों में असर की संभावना
संगठनों का कहना है कि कुछ राज्यों में हड़ताल का व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है, जबकि अन्य राज्यों में भी परिवहन, बैंकिंग, डाक सेवाओं और औद्योगिक गतिविधियों पर आंशिक असर पड़ने की संभावना है। हालांकि, प्रशासन की ओर से अभी तक औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
किसानों और कृषि श्रमिकों का समर्थन
संयुक्त किसान मोर्चा सहित कई किसान संगठनों ने भी इस हड़ताल को समर्थन देने की घोषणा की है। कृषि श्रमिक संगठनों ने मनरेगा (एमजीएनआरईजीए) से जुड़े मुद्दों और ग्रामीण रोजगार को लेकर अपनी चिंताओं को प्रमुखता से उठाया है। छात्र और युवा संगठनों के भी कई स्थानों पर इस अभियान से जुड़ने की खबर है।
यूनियनों की मुख्य मांगें
हड़ताल का आह्वान करने वाले संगठनों ने चारों श्रम संहिताओं को वापस लेने, बीज विधेयक के मसौदे को रद्द करने, विद्युत संशोधन विधेयक को वापस लेने और अन्य नीतिगत बदलावों की मांग उठाई है। इसके अलावा, ग्रामीण रोजगार और आजीविका से संबंधित प्रस्तावित कानूनों को लेकर भी विरोध जताया गया है।
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संयुक्त मंच में कई प्रमुख राष्ट्रीय ट्रेड यूनियनें शामिल हैं, जो सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। संगठनों का कहना है कि यदि सरकार उनकी मांगों पर सकारात्मक पहल नहीं करती, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
हड़ताल के मद्देनज़र आम नागरिकों को आवश्यक सेवाओं और परिवहन से जुड़ी संभावित असुविधाओं के लिए पहले से तैयारी रखने की सलाह दी जा रही है।

