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BNS विधेयक-2 में व्यभिचार, बिना सहमति के समलैंगिक यौन संबंध को अपराध मानने वाले प्रावधान शामिल नहीं

December 14, 2023

BNS विधेयक-2 में व्यभिचार, बिना सहमति के समलैंगिक यौन संबंध को अपराध मानने वाले प्रावधान शामिल नहीं

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने व्यभिचार को अपराध मानने वाले ‘लिंग-तटस्थ‘ (जेंडर न्यूट्रल) प्रावधान और गैर-सहमति वाले समलैंगिक यौन संबंधों को अलग से अपराध मानने की धारा को शामिल करने की संसदीय पैनल की सिफारिश को शामिल नहीं किया है।इस बीच, संशोधित भारतीय न्याय (द्वितीय) संहिता विधेयक, 2023 में वैवाहिक संबंधों में महिलाओं के खिलाफ ‘क्रूरता‘ को परिभाषित करने और बलात्कार पीड़िता की पहचान का खुलासा करने वाली अदालती कार्यवाही के प्रकाशन को दंडित करने के लिए दो नए प्रावधान जोड़े गए हैं।

औपनिवेशिक युग के भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) को बदलने के लिए संशोधित भारतीय न्याय (द्वितीय) संहिता विधेयक, 2023, भारतीय साक्ष्य (द्वितीय) संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मंगलवार को लोकसभा में पेश किया।शाह ने इस साल अगस्त में पेश किए गए तीन आपराधिक विधेयकों को वापस ले लिया, फिर विधेयकों को संसदीय पैनल के पास भेजा गया।बीएनएस-द्वितीय विधेयक के अनुसार, इसमें व्यभिचार के लिए संसदीय पैनल के सुझावों को शामिल नहीं किया गया है, जिसे 497 के तहत जोड़ा गया था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने समाप्त कर दिया था।

बीएनएस-द्वितीय विधेयक में धारा 377 भी नहीं है, जो प्रकृति के आदेश के विरुद्ध अप्राकृतिक यौन संबंध से संबंधित है।विधेयक पारित होने के बाद ये दो धाराएं 377 और 497 अस्तित्व में नहीं रहेंगी।संसदीय पैनल ने 497 के तहत व्यभिचार को जोड़ा था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए समाप्त कर दिया कि इसे इसलिए जोड़ा गया, क्योंकि ‘विवाह की संस्था पवित्र है‘ और इसे ‘संरक्षित‘ किया जाना चाहिए।बीएनएस-दूसरे विधेयक में दो और नए जोड़े गए हैं।

बीएनएस-दूसरे में जो दो नए खंड जोड़े गए हैं उनमें धारा 73 शामिल है जो कहती है कि जो कोई भी धारा 72 में निर्दष्टि अपराध के संबंध में अदालत के समक्ष किसी भी कार्यवाही के संबंध में किसी भी मामले को ऐसे न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना मुद्रित या प्रकाशित करेगा। किसी एक अवधि के लिए कारावास से दंडित किया जाएगा जिसे दो साल तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।इसमें यह भी कहा गया कि किसी भी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के फैसले का मुद्रण या प्रकाशन इस धारा के अर्थ में अपराध नहीं है।हालांकि, सरकार ने मॉब लिंचिंग द्वारा हत्या के लिए वैकल्पिक सजा को खत्म करने की पैनल की सिफारिश को स्वीकार कर लिया है – जो मूल बीएनएस बिल के खंड 101 (2) में सात साल से कम नहीं प्रस्तावित है – और इसे हत्या के लिए सजा के बराबर बना दिया है।

यहां तक कि धारा 103 (2) के तहत संशोधित बीएनएस विधेयक कहता है कि जब पांच या अधिक व्यक्तियों का समूह एक साथ मिलकर नस्ल, जाति या समुदाय, लिंग, जन्म स्थान, भाषा या व्यक्तिगत आस्था के आधार पर हत्या करता है, तो किसी अन्य समान आधार पर ऐसे समूह के प्रत्येक सदस्य को मृत्युदंड या आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा और वह जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।

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