मामला यहीं खत्म होता तो फाइलों में दब जाता, लेकिन कैमरे ने वह दिखा दिया, जो सरकारी रिपोर्टें अक्सर नहीं दिखा पातीं। सांसद के हाथ का काजू कैमरे में आया और सोशल मीडिया पर खेत से भी तेज फैल गया। किसान की सूखी फसल खबर नहीं बनी, काजू बन गया। यही विरोधाभास है—संकट सूखता रहा और उसकी साइड-डिश चर्चा में रही। एक ओर किसान की मिट्टी नमी को तरस रही थी, दूसरी ओर मेज पर सूखे मेवों की चमक थी। दोनों तरफ सूखापन था—किसान का संकट, मेवे का सरकारी आतिथ्य। कैमरे ने दोनों को एक फ्रेम में रखकर वह दूरी दिखा दी, जो खेत और सरकार के बीच किलोमीटरों की नहीं, संवेदना की है।
नांदेड़ बैठक के बाद हिंगोली में किसान ने पत्ते पर काजू-बादाम रखकर कृषि मंत्री को पेश किए, तो विरोध की भाषा बदल दी। यह भेंट नहीं, व्यवस्था को लौटाया गया उसका अपना स्वाद था—लीजिए साहब, बैठक में जो खाया था, वही खेत से उठाकर आपके सामने रख रहे हैं। कभी राजा को सोना-चाँदी भेंट किया जाता था; लोकतंत्र में किसान ने काजू-बादाम लौटा दिए। मगर उस पत्ते पर मेवे कम, सवाल ज्यादा था—जब आपकी मेज पर काजू है, तो हमारे खेत में पानी क्यों नहीं? यह भेंट नहीं, हिसाब था। किसान कह रहा था—हम आपकी मेज का स्वाद जानते हैं, आप हमारे खेत की प्यास जानिए। पत्ते पर रखा काजू मेवा नहीं, ऐसा सवाल था जिसे फाइल में दबाया नहीं जा सकता।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी कवायद को व्यवस्था ने एक शब्द में समेट दिया—प्रथा। जिस काम का कारण बताना कठिन हो, उसे प्रथा कह देना सबसे आसान रास्ता है। बैठक होगी तो नाश्ता होगा, नाश्ता होगा तो ड्राई फ्रूट्स होंगे, मेवे होंगे तो कोई खाएगा, तस्वीर बनेगी, विवाद होगा, संवेदनशीलता की अपील होगी और कुछ दिन बाद फिर वही थाली सज जाएगी। व्यवस्था का यह चक्र इतना सुचारु है कि सूखा भी इसे नहीं रोकता। बाढ़ आए, अकाल आए, किसान आत्महत्या करे या गाँव में पानी के लिए लाइन लगे—बैठक की मेज अपनी मर्यादा नहीं छोड़ती। हमारी प्रशासनिक संवेदना का सबसे मजबूत स्तंभ शायद कुर्सी नहीं, नाश्ते की प्लेट है।
काजू-बादाम की यह कहानी सिर्फ नांदेड़ तक सीमित नहीं; आपदाओं की समीक्षा बैठकों में अक्सर नाश्ते का इंतजाम भी होता है—मानो हर आपदा का अपना मेन्यू हो। आपदा जितनी गंभीर, नाश्ता उतना प्रतिष्ठित! किसान के घर चूल्हा ठंडा पड़े तो संकट, लेकिन बैठक में नाश्ता ठंडा हो जाए तो प्रशासनिक असुविधा। सूखे में किसान को मुआवजा, पानी, बीज और फसल चाहिए; व्यवस्था की चिंता है कि बैठक में किसी की ऊर्जा कम न हो। किसान खेत में पसीना बहाकर और व्यवस्था बैठक में काजू खाकर अपने-अपने तरीके से राष्ट्रनिर्माण में जुटी है।
कटघरे में काजू-बादाम हैं, जिनका अपराध सिर्फ इतना है कि वे गलत जगह थे। पेड़ से निकले, मजदूर ने तैयार किए, व्यापारी ने खरीदे, दुकानदार ने बेचे, कार्यालय ने बिल बनाया, कर्मचारी ने मंगाया और वे बैठक की प्लेट तक पहुँचे। फिर एक सांसद ने उन्हें उठाया और विवाद का बोझ उन्हीं पर आ गया। मेवे उस गवाह जैसे हैं, जो घटनास्थल पर था, अपराधी नहीं। सवाल है—उन्हें वहाँ किसने और क्यों रखवाया? क्या किसी ने सोचा कि सूखे की बैठक में काजू-बादाम का यह दृश्य कैसा लगेगा? हमारी व्यवस्था में जवाबदेही भी काजू-बादाम जैसी है—एक हाथ से दूसरे हाथ घूमती रहती है। अंत में प्लेट खाली होती है, जिम्मेदारी भी।
पूरी तस्वीर एक पत्ते और प्लेट के बीच सिमट जाती है—किसान के हाथ में पत्ता और सत्ता के सामने प्लेट। नेता इसमें प्रशासन देखते हैं, प्रशासन प्रक्रिया और विपक्ष संवेदनशीलता का सवाल; लेकिन किसान अपने खेत में खड़ा है। उसके सामने सूखी मिट्टी, फटी जमीन, खाली कुआँ और अनिश्चित मौसम है। उसके पास न टीवी बहस का समय है, न बयान लिखने का। इसलिए उसने पत्ते पर वही रख दिया, जो बैठक की मेज पर देखा था। बात इतनी-सी है, लेकिन गहरी—जिस किसान की समस्या पर बैठक हो रही थी, उसे मेज पर जगह नहीं मिली; उसके खेत से उठा सवाल जरूर उसी मेज तक पहुँच गया।
व्यवस्था की याददाश्त बड़ी दिलचस्प है। बैठक खत्म होते ही काजू-बादाम की चर्चा भी खत्म हो जाएगी, लेकिन जिस सूखे पर बैठक हुई, वह खत्म नहीं होगा। फाइल आगे बढ़ेगी, अधिकारी बदलेंगे, अगली बैठक होगी और मेज पर काजू की जगह कुछ और होगा। किसान का सवाल फिर भी वहीं रहेगा। असली दूरी काजू और किसान के बीच नहीं, बैठक की मेज और सूखे खेत के बीच है। किसान ने पत्ते पर काजू रखकर बस इतना दिखाया है कि जिस समस्या पर बैठक हो रही है, उसकी असली तस्वीर बैठक की मेज पर नहीं है। पत्ता हट जाएगा, तस्वीर बदल जाएगी, लेकिन सवाल रहेगा—जिस खेत के लिए बैठक हुई, वहाँ पानी कब पहुँचेगा?
-प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
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