Collected scrap and donated Rs 35 lakh : कैथल। कपिस्थल की गलियों में एक शख्स ऐसा भी है, जिसके पास न बड़ी दौलत, न आलीशान घर और न ही कोई ऊंचा पद है। उसके हाथ में कबाड़ बीनने की थैली है, लेकिन दिल इतना बड़ा कि वह अपनी मेहनत की कमाई से 35 लाख रुपये दान कर चुका है। नाम है फकीरचंद।
फकीरचंद हर रोज 600-700 रुपये कमाने वाला साधारण आदमी है। खुद शादी नहीं की, लेकिन कई गरीब बेटियों के हाथ पीले करा चुका है। अब तक करीब 35 लाख रुपये दान कर चुके फकीरचंद इस बात का जीता-जागता उदाहरण हैं कि अमीरी जेब से नहीं, इंसानियत और दिल से होती है। अकेला जीवन बिताने वाले फकीरचंद के घर की बात करें तो 200 गज की जमीन पर बने एक कमरे में वह अकेला रहता है। वह कीपैड वाला फोन चलाता है। कमरे में लोहे का गेट लगा है और यहां कबाड़ पड़ा रहता है। एक सीलिंग फैन है, पुराना संदूक, कुछ बर्तन, दीवारों पर कई देवी-देवताओं की फोटो हैं।
फकीरचंद बताते हैं कि वे 5 भाई-बहन थे। 4 का देहांत हो चुका है और हममें से किसी की भी शादी नहीं हुई। वह घर में अकेले ही रहते हैं। फकीरचंद कहते हैं कि मरने से पहले इस मकान को भी दान करके जाऊंगा। फकीरचंद कहते हैं कि भाई-बहनों के गुजर जाने के बाद पारिवारिक जायदाद मुझे ही मिली। मैं चाहता तो जिंदगीभर आराम से बैठकर खा सकता था। सारी सुख-सुविधाओं का आनंद ले सकता था, लेकिन मेरा विश्वास मेहनत करके कमाने-खाने पर है। जब तक मेहनत करता रहूंगा, शरीर भी ठीक रहेगा और शायद इस जन्म में किए गए पुण्य का फल मुझे अगले जन्म में मिले।
फकीरचंद बताते हैं कि वे पिछले 25 साल से कबाड़ बीनने का काम कर रहे हैं। पैदल ही दुकानों से गत्ता खरीदते हैं और फिर उसे कबाड़ी को बेच देता है। इससे 600-700 रुपये की हर रोज कमाई हो जाती है। कमाई की रकम को बैंक अकाउंट में जमा करा देते हैं। जब ज्यादा रकम इकठ्ठा हो जाती है तो उसे विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को दान दे देते हैं या फिर सामाजिक कार्यों में लगा देते हैं। फकीरचंद अब तक गरीब परिवार से आने वालीं 5 लड़कियों की शादी करा चुके हैं। उन्होंने हर एक लड़की को 75 हजार रुपये का सामान भी दिया।
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