कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस गंभीर राजनीतिक संकट से जूझती नजर आ रही है। चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है और नेताओं के साथ-साथ सांसदों के बागी तेवर भी नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं।
हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब राज्यसभा सदस्य सुष्मिता देव ने पार्टी और राज्यसभा दोनों से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के बाद पार्टी में अंदरूनी कलह और तेज होने की चर्चा है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि कई सांसद नेतृत्व से नाराज हैं और भविष्य की राजनीतिक रणनीति को लेकर अलग राह चुनने पर विचार कर रहे हैं। राजनीतिक हलकों में सबसे अधिक चर्चा उन खबरों को लेकर है, जिनमें करीब 19 से 20 सांसदों के एक अलग गुट के रूप में सक्रिय होने और पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोलने की बात कही जा रही है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार इन सांसदों ने अलग संसदीय पहचान बनाने की कोशिश भी शुरू कर दी है, हालांकि पार्टी नेतृत्व इस संकट को नियंत्रित करने में जुटा है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि सांसदों और वरिष्ठ नेताओं का पलायन जारी रहा तो ममता बनर्जी के सामने केवल विपक्ष की भूमिका निभाने की चुनौती ही नहीं होगी, बल्कि पार्टी की एकजुटता बनाए रखना भी बड़ी परीक्षा बन जाएगा। चुनावी हार के बाद संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवाल तृणमूल कांग्रेस के भविष्य पर भी असर डाल सकते हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि ममता बनर्जी बागी नेताओं को मनाने में सफल होती हैं या तृणमूल कांग्रेस में टूट और तेज होती है। फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी पार्टी को फिर से एकजुट कर पाएंगी या बगावत का यह दौर उनके राजनीतिक भविष्य को और कठिन बना देगा।
अब तक पार्टी के जिन लोगों के पार्टी छोड़ने की बात की जा रही है, उनमें ये लोग शामिल हैं।
बारासात लोकसभा सीट से लगातार 3 बार की सांसद और टीएमसी महिला विंग का सबसे बड़ा चेहरा थीं. डॉ काकोली घोष दस्तीदार इस विद्रोह की मुख्य सूत्रधार और कमांडर-इन-चीफ मानी जा रही हैं. उन्होंने अभिषेक बनर्जी के कॉरपोरेट तानाशाही रवैये के खिलाफ सबसे पहले मोर्चा खोला और दिल्ली में लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर टीएमसी के संसदीय दल को दोफाड़ करने में सबसे बड़ी भूमिका निभायी. अभी 20 बागी सांसदों के गुट का नेतृत्व कर रही हैं.
बीरभूम संसदीय क्षेत्र से लगातार चौथी बार की लोकप्रिय सांसद और बंगाली सिनेमा की बेहद खूबसूरत और दिग्गज अभिनेत्री शताब्दी रॉय का बागी खेमे में जाना ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा व्यक्तिगत झटका है। अनुब्रत मंडल के जेल जाने के बाद बीरभूम के संगठन को संभालने वाली शताब्दी ने अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली और टिकट बंटवारे में आई-पैक (I-PAC) के अत्यधिक हस्तक्षेप पर तीखा हमला बोलते हुए विद्रोह का झंडा बुलंद किया।
एक्टर से नेता बनीं जून मालिया ने भी ममता बनर्जी को गच्चा देते हुए बागी सांसदों का समर्थन कर दिया है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री ने कोलाघाट में एक प्रशासनिक बैठक की थी। बैठक में जून मालिया और तृणमूल कांग्रेस के सांसद दीपक अधिकारी उर्फ देव उसमें शामिल हुए थे।
रचना बनर्जी भी फिल्म जगत से राजनीति में आयी थीं। वह हुगली लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुई थीं। कथित तौर पर उन्होंने भी बागियों के खेमे में अपना नाम लिखवा लिया है।
बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री के सबसे लोकप्रिय अभिनेताओं में शुमार दीपक अधिकारी, जिन्हें देव के नाम से जाना जाता है, घाटाल लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे। उन्होंने ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी से दूरी बना ली है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री के साथ एक प्रशासनिक बैठक में उनका शामिल होना यह बताता है कि उन्होंने बागी गुट का समर्थन कर दिया है।
टीएमसी के पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता शांतनु सेन ने पार्टी से इस्तीफा देकर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती दी। सांसदों ने जब दिल्ली में बगावत का झंडा बुलंद किया, तो शांतनु सेन भी उसमें शामिल हो गये।
तृणमूल कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में एक सुखेंदु शेखर रॉय राज्यसभा के सदस्य हैं। उन्होंने 8 जून को पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया। हालांकि, अभी तक स्पष्ट जानकारी नहीं है कि वह बागी गुट के साथ हैं या नहीं। वह भाजपा में शामिल होंगे या नहीं, यह भी स्पष्ट नहीं है। हालांकि, वह कई बार कह चुके हैं कि तृणमूल कांग्रेस को अब कोई नहीं बचा पायेगा।
असम में तृणमूल कांग्रेस ने जिस सुष्मिता देव को अपनी पार्टी का चेहरा बनाया था, उसने भी टीएमसी को टाटा, बाय-बाय बोल दिया है। बुधवार को उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, सुष्मिता ने ममता बनर्जी के बारे में कुछ नहीं कहा, लेकिन इस्तीफे के बाद कहा कि वह दो नाव की सवारी नहीं कर सकतीं।
बहरमपुर सीट से कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी को हराकर सांसद बने पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान की रहस्यमयी चुप्पी ने ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की धड़कनें तेज कर दी हैं। ममता की करीबी महुआ मोईत्रा ने यूसुफ पठान को रीढ़विहीन नेता करार देते हुए उन पर जोरदार हमला बोला था। इसलिए आशंका जतायी जा रही है कि यूसुफ भी बागी गुट के साथ हो गये हैं।
आसनसोल के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा, जो ममता बनर्जी के लिए खुलकर बैटिंग करते थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों की धज्जियां उड़ाते रहते थे, उन्होंने भी चुप्पी साध रखी है. इसे ममता बनर्जी के लिए बड़े खतरे के रूप में देखा जा रहा है। वह न तो ममता के समर्थन में कुछ बोल रहे हैं, न टीएमसी के विरोध में।
मुर्शिदाबाद के बड़े नेता और तृणमूल कांग्रेस के सांसद अबू ताहिर खान ने भी बागी गुट ज्वाइन कर लिया है।
बैरकपुर के सांसद पार्थ भौमिक ने पाला बदल लिया है। ममता बनर्जी को अकेला छोड़ वह काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व वाले बागी गुट के साथ चले गये हैं।
मथुरापुर के सांसद बापी हलदार भी टीएमसी के विद्रोही गुट में शामिल हैं।
आरामबाग की सांसद मिताली बाग अब ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी को अपना नेता नहीं मानतीं। वह काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई वाले बागी गुट के साथ हो गयीं हैं।
झारग्राम के कद्दावर नेता और सांसद कालीपद सोरेन ने तृणमूल कांग्रेस को छोड़ने का ऐलान तो नहीं किया है, लेकिन वह विद्रोही गुट में शामिल हैं।
बांकुड़ा के टीएमसी नेता अरूप चक्रवर्ती अब एनडीए को समर्थन देने वाले बागी गुट के साथ हैं. इससे ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ गयीं हैं।
बर्धमान पूर्व की सांसद डॉ शर्मिला सरकार ने भी दीदी को टाटा-बाय-बाय बोल दिया है। वह अब बागी गुट के नेताओं के साथ हैं, जिसने नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार को अपना समर्थन देने का ऐलान किया है।
बोलपुर के तृणमूल नेता असित कुमार मल भी बागी हो गये हैं। बंगाल चुनाव के बाद टीएमसी में बगावत के बाद जो नया गुट नयी दिल्ली में तैयार हुआ है, उसके सदस्य असित कुमार मल भी हैं।
कूचबिहार से तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जगदीश चंद्र बसुनिया भी बागी हो गये हैं।
ममता बनर्जी की बेहद करीबी रहीं माला रॉय अब दीदी के साथ नहीं हैं. उन्होंने काकोली घोष दस्तीदार के बागी गुट को ज्वाइन कर लिया है।
विद्रोह करने वाले ये नेता कोई साधारण नेता या कार्यकर्ता नहीं हैं. ये तृणमूल कांग्रेस के वो कद्दावर चेहरे हैं, जिन्होंने 3 दशक तक ममता बनर्जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पार्टी को खड़ा किया. आइए, जानते हैं उन प्रमुख दिग्गज नेताओं की पूरी लिस्ट और उनकी संक्षिप्त प्रोफाइल, जिन्होंने टीएमसी की रीढ़ को पूरी तरह तोड़कर रख दिया है.
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