Site icon Dainik Savera Times

हफ्ते में 70 से 100 घंटे तक काम करके डॉक्टर खुद बन रहे ‘मरीज’, पांच साल में 150 सुसाइड

लुधियाना Doctors : वैसे तो हर पेशे की अपनी चुनौतियां होती हैं लेकिन डॉक्टरी पेशा अपने भारी दायित्व के कारण अलग पहचान रखता है। मरीज के लिए आशा का प्रतीक माने जाने वाले डॉक्टर्स इंटरसैक्शन ऑफ साइंस, अनिश्चितता और मानवीय पीड़ा के बीच काम करते हैं। फिर भी आम लोगों की धारणा अक्सर फिल्मों, टीवी या सनसनीखेज रिपोर्टो में नाटकीय चित्रण से प्रभावित होती है, जो ऐसे अविश्वास को जन्म देता है, जो मरीजों और हैल्थकेयर प्रोवाइडर्स दोनों को नुक्सान पहुंचा सकता है। जब मरीज डॉक्टरों के पास ‘उन्हें सिर्फ पैसे की परवाह है’ या‘वे समय नहीं देते’ जैसे पूर्वाग्रहों के साथ जाते हैं तो इससे उनके इलाज में रुकावटें आती हैं। लोग अक्सर भूल जाते हैं कि डॉक्टर भी उनकी तरह ही इंसान है। उन्हें भी तनाव, पारिवारिक समस्याओं, बीमारियों और भावनात्मक थकान का सामना करना पड़ता है। आईएमए लुधियाना के प्रधान डॉ. धीरज अग्रवाल व पूर्व सैक्रेटरी डॉ. आशीष ओहरी ने यह बातें कहीं।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से हाल ही में केंद्र सरकार और नैशनल मैडीकल कमिशन को दिए गए नोटिस ने पूरे भारत में रैजिडैंट डॉक्टरों के ‘इनह्यूमन वर्किग आवर्स’ की ओर ध्यान आकर्षित किया है। 1992 में प्रतिदिन 12 घंटे और प्रति सप्ताह 48 घंटे से ज्यादा काम न करने के निर्देशों के बावजूद युवा डॉक्टर अक्सर बिना पर्याप्त आराम के हफ्ते में 70-100 घंटे काम करते हैं। इस साल की शुरु आत में हुए एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण से पता चला है कि 86 फीसदी मैडीकल छात्र और डॉक्टर मानते हैं कि जरूरत से ज्यादा काम के घंटे उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुक्सान पहुंचा रहे हैं और मरीजों की सुरक्षा से समझौता कर रहे हैं। भारत में केवल पांच वर्षों में मैडीकल छात्रों और डॉक्टरों के बीच 150 से ज्यादा आत्महत्याएं हुई हैं, जिनका मुख्य कारण तनाव, नींद की कमी और प्रतिकूल कार्य वातावरण है।

डॉक्टर से इंसटैंट रिजल्ट चाहते हैं मरीज
डॉ. धीरज अग्रवाल और आशीष ओहरी के मुताबिक लोकप्रिय मीडिया अक्सर डॉक्टरों को या तो चमत्कारी या खलनायक के रूप में चित्रित करता है। ऐसे किरदार जो या तो कुछ ही पलों में जान बचा लेते हैं या लापरवाही के कारण नाकाम हो जाते हैं, जबकि असली चिकित्सा वास्तविक स्थितियां ऐसी नहीं होती हैं। डॉक्टर को ऐसी बीमारियां जिनका मानक उपचारों से कोई असर नहीं होता, कुछ ही सैकेंड में सामने आने वाली आपात स्थितियां, भीड़-भाड़ वाले सरकारी अस्पतालों में सीमित संसाधन जैसी अनिश्चितताओं से जूझना पड़ता है। भारत में ज्यादातर डॉक्टर दुनिया भर के डॉक्टरों की तुलना में कठिन कामकाजी परिस्थितियों और कम वेतन के बावजूद, ईमानदारी से अपनी सेवाएं देते रहते हैं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप डॉक्टरों के लिए काम करने की परिस्थितियों को और ज्यादा मानवीय बनाने की उम्मीद की किरण दिखाता है लेकिन कानूनी निर्देशों से परे समाज को चिकित्सा के बारे में अपनी धारणा बदलनी होगी। उन्हें यह समझना होगा कि डॉक्टरी पेशा परिणाम डॉक्टर के नियंत्रण से परे कई कारकों पर निर्भर करते हैं।

Exit mobile version