इंटरनेशनल डेस्कः राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इमीग्रेशन और विदेशी कर्मचारियों की भर्ती से जुड़ी नीतियों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। इसी बीच, अमेरिकी श्रम विभाग की ओर से माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी और भारत की कई बड़ी आईटी कंपनियों से जुड़े PERM प्रोग्राम पर रोक लगाए जाने की खबर सामने आई है। इस सूची में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इंफोसिस, विप्रो, एचसीएल, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी जैसी कंपनियों के नाम भी शामिल बताए जा रहे हैं। इस कदम को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा उन भारतीय कर्मचारियों के बीच हो रही है, जो अमेरिका में नौकरी कर रहे हैं और लंबे समय से ग्रीन कार्ड मिलने का इंतजार कर रहे हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह PERM प्रोग्राम क्या है? कंपनियों पर कार्रवाई क्यों की गई है? क्या इससे अमेरिका में काम कर रहे भारतीयों की नौकरी चली जाएगी, या उनके ग्रीन कार्ड मिलने में देरी होगी? आइए, इन सभी सवालों को आसान भाषा में समझते हैं।
सबसे पहले जानिए, PERM प्रोग्राम क्या होता है
PERM अमेरिका में विदेशी कर्मचारियों को स्थायी रूप से नौकरी पर रखने और उनके ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया आगे बढ़ाने से जुड़ा एक महत्वपूर्ण चरण है। PERM की शुरुआत वर्ष 2005 में हुई थी। आसान शब्दों में समझें तो जब अमेरिका की कोई कंपनी किसी विदेशी कर्मचारी को लंबे समय के लिए अपने यहां नौकरी पर रखना चाहती है और उसके ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया शुरू करना चाहती है, तो आमतौर पर उसे PERM लेबर सर्टिफिकेशन की जरूरत पड़ती है।
इस प्रक्रिया में अमेरिकी श्रम विभाग यह जांचता है कि संबंधित नौकरी के लिए योग्य अमेरिकी कर्मचारी उपलब्ध हैं या नहीं। कंपनी को यह साबित करना होता है कि निर्धारित भर्ती प्रक्रिया के बावजूद उसे उस पद के लिए पर्याप्त योग्य अमेरिकी कर्मचारी नहीं मिले और विदेशी कर्मचारी को नौकरी पर रखने से अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन और कामकाजी परिस्थितियों पर गलत असर नहीं पड़ेगा।
यदि श्रम विभाग की ओर से मंजूरी मिल जाती है, तो कंपनी आगे ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया के लिए आवेदन कर सकती है। हालांकि, PERM की मंजूरी मिलने का मतलब यह नहीं है कि कर्मचारी को तुरंत ग्रीन कार्ड मिल जाएगा। इसके बाद भी कई अन्य चरण पूरे करने होते हैं।
आखिर इन कंपनियों पर रोक क्यों लगाई गई
अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि विदेशी कर्मचारियों की भर्ती से जुड़े नियमों का सही तरीके से पालन होना चाहिए, ताकि अमेरिकी नागरिकों के रोजगार के अवसर सुरक्षित रहें। ट्रंप प्रशासन की नीतियों में अमेरिकी नागरिकों को प्राथमिकता देने और विदेशी कर्मचारियों की भर्ती पर निगरानी बढ़ाने पर जोर दिया जाता रहा है। इस मामले में आरोप लगाया गया है कि कुछ बड़ी कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए इमीग्रेशन से जुड़े कार्यक्रमों का गलत इस्तेमाल कर सकती हैं।
आरोपों के मुताबिक, अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशी कामगारों को कम वेतन पर रखने की आशंका है, जिससे स्थानीय लोगों के रोजगार पर असर पड़ सकता है। हालांकि, इन आरोपों को संबंधित कंपनियों के खिलाफ साबित हो चुके तथ्यों के रूप में नहीं देखना चाहिए। किसी कंपनी पर PERM से जुड़ी रोक लगाए जाने के वास्तविक कारणों और उसके दायरे की पुष्टि संबंधित सरकारी आदेशों से ही की जा सकती है।
भारतीय आईटी कंपनियों पर कार्रवाई से क्यों बढ़ी चिंता
भारत की कई बड़ी आईटी कंपनियां अमेरिका में कारोबार करती हैं और वहां बड़ी संख्या में भारतीय कर्मचारियों को रोजगार देती हैं। इनमें TCS, इंफोसिस, विप्रो, एचसीएल, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी जैसी कंपनियां शामिल हैं। इसके अलावा, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी जैसी अमेरिकी कंपनियों में भी बड़ी संख्या में विदेशी पेशेवर काम करते हैं। यदि किसी कंपनी को वास्तव में PERM आवेदन दाखिल करने से प्रतिबंधित किया जाता है, तो उस रोक के दायरे में आने वाले कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
ऐसे कर्मचारियों को स्थायी निवास के लिए दूसरे चरणों तक पहुंचने में देरी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, इसका असर हर कर्मचारी पर एक जैसा नहीं होगा। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित कर्मचारी किस वीजा पर अमेरिका में रह रहा है, उसकी ग्रीन कार्ड प्रक्रिया किस चरण में है और प्रतिबंध किन आवेदनों पर लागू होता है।
अमेरिका में काम कर रहे भारतीयों पर क्या होगा असर
इस फैसले को लेकर सबसे बड़ा सवाल उन भारतीय कर्मचारियों का है, जो H-1B वीजा पर अमेरिका में काम कर रहे हैं और ग्रीन कार्ड मिलने का इंतजार कर रहे हैं। H-1B वीजा विदेशी पेशेवरों को अमेरिका में निर्धारित शर्तों के तहत काम करने की अनुमति देता है। यह स्थायी निवास का दर्जा नहीं है। इसके विपरीत, ग्रीन कार्ड मिलने के बाद व्यक्ति को अमेरिका में स्थायी निवासी के रूप में रहने और काम करने का अधिकार मिलता है, हालांकि इसके साथ भी कुछ कानूनी नियम लागू होते हैं।
कई भारतीय कर्मचारी वर्षों तक अमेरिका में नौकरी करते रहते हैं, लेकिन ग्रीन कार्ड मिलने में लंबा समय लग सकता है। ऐसे में उनकी कंपनी यदि PERM प्रक्रिया शुरू करती है, तो यह उनके स्थायी निवास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होता है।
अगर कंपनी के PERM आवेदनों पर रोक लागू होती है, तो प्रभावित कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है। जिन लोगों की प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हुई है, उन्हें नई प्रक्रिया शुरू करने में भी परेशानी आ सकती है। हालांकि, सभी भारतीय कर्मचारियों के ग्रीन कार्ड आवेदन अपने आप रद्द हो जाएंगे, ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। इसके लिए संबंधित आदेश की शर्तों और प्रत्येक आवेदन की स्थिति को देखना जरूरी है।
क्या भारतीयों की नौकरी भी चली जाएगी
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। PERM प्रक्रिया पर रोक लगने का मतलब अपने आप यह नहीं है कि संबंधित कंपनियों में काम कर रहे सभी विदेशी कर्मचारियों की नौकरी समाप्त हो जाएगी। H-1B वीजा और PERM लेबर सर्टिफिकेशन दो अलग-अलग चीजें हैं। H-1B वीजा किसी विदेशी कर्मचारी को निर्धारित शर्तों के तहत अमेरिका में काम करने की अनुमति देता है, जबकि PERM ग्रीन कार्ड की रोजगार-आधारित प्रक्रिया का एक हिस्सा है।
इसलिए, यदि किसी कर्मचारी का H-1B वीजा वैध है और वह उसकी शर्तों का पालन कर रहा है, तो केवल PERM प्रक्रिया पर रोक लगने से उसका वीजा अपने आप रद्द नहीं हो जाता। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि कर्मचारी की स्थिति पर भविष्य में कोई असर नहीं पड़ेगा। अगर ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया लंबी खिंचती है, तो वीजा की अवधि, उसके विस्तार की पात्रता और नौकरी से जुड़े दूसरे नियम महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे कर्मचारियों की मुश्किलें कैसे बढ़ सकती हैं
अमेरिका में स्थायी रूप से बसने की इच्छा रखने वाले भारतीय पेशेवरों के लिए ग्रीन कार्ड बेहद महत्वपूर्ण है। इसके जरिए उन्हें स्थायी निवासी का दर्जा मिलता है। यदि PERM प्रक्रिया रुक जाती है, तो इससे प्रभावित कर्मचारियों के लिए आगे की प्रक्रिया शुरू करना या उसे पूरा करना मुश्किल हो सकता है। इसका असर मुख्य रूप से तीन तरह से समझा जा सकता है। पहला, ग्रीन कार्ड मिलने में देरी: जिन कर्मचारियों के लिए PERM की मंजूरी जरूरी है, उनकी प्रक्रिया आगे बढ़ने में रुकावट आ सकती है।
दूसरा, भविष्य की योजना पर असर: लंबे समय से अमेरिका में रहने और काम करने की योजना बना रहे कर्मचारियों को अपने वीजा, नौकरी और परिवार से जुड़ी योजनाओं पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है।
तीसरा, वीजा की स्थिति को लेकर चिंता: जिन कर्मचारियों का H-1B वीजा सीमित अवधि के लिए वैध है, उनके लिए ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया में देरी होने पर वीजा विस्तार से जुड़े नियम अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
हालांकि, हर कर्मचारी के मामले में स्थिति अलग हो सकती है। किसी को कितना इंतजार करना पड़ेगा या उसका आवेदन किस तरह प्रभावित होगा, यह संबंधित सरकारी आदेश और उसकी व्यक्तिगत इमीग्रेशन स्थिति पर निर्भर करेगा।
क्या अमेरिका में स्थायी रूप से बसने का सपना खत्म हो गया
ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। PERM प्रक्रिया पर किसी कंपनी के लिए रोक लगने का मतलब यह नहीं है कि उस कंपनी में काम करने वाले सभी विदेशी कर्मचारियों के लिए अमेरिका में स्थायी निवास का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया है।
सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि प्रतिबंध अस्थायी है या किसी अन्य अवधि के लिए लगाया गया है। साथ ही, यह भी समझना होगा कि रोक किन आवेदनों पर लागू होती है और क्या किसी तरह की अपील या अन्य कानूनी प्रक्रिया उपलब्ध है। इसके अलावा, ग्रीन कार्ड की कुछ अन्य श्रेणियां भी हैं, जिनमें पात्रता के आधार पर अलग-अलग नियम लागू होते हैं। हालांकि, हर कर्मचारी इन विकल्पों के लिए योग्य नहीं होता।
इसलिए प्रभावित कर्मचारियों को अपनी स्थिति के अनुसार अमेरिकी इमीग्रेशन कानून के विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए और किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक आदेश की जानकारी देखनी चाहिए।
भारतीय युवाओं के लिए इस फैसले का क्या संदेश है
अमेरिका में नौकरी करने का सपना देखने वाले भारतीय युवाओं के लिए यह मामला एक महत्वपूर्ण संकेत है कि विदेशी कर्मचारियों की भर्ती और स्थायी निवास से जुड़ी नीतियों में बदलाव का असर उनके करियर पर पड़ सकता है।
आईटी सेक्टर में काम करने वाले युवाओं को नौकरी का प्रस्ताव स्वीकार करने से पहले वीजा की शर्तों, कंपनी की इमीग्रेशन संबंधी नीतियों और ग्रीन कार्ड प्रायोजन की प्रक्रिया को समझना चाहिए। सिर्फ किसी बड़ी कंपनी में नौकरी मिल जाना इस बात की गारंटी नहीं है कि कर्मचारी को भविष्य में ग्रीन कार्ड भी मिल जाएगा। ग्रीन कार्ड के लिए पात्रता, सरकारी मंजूरी, आवेदन की श्रेणी और दूसरे कानूनी नियम महत्वपूर्ण होते हैं।

