Gig worker: मोबाइल स्क्रीन पर 10 मिनट में डिलीवरी का वादा भले ही अब कंपनियों ने वापस ले लिया हो, लेकिन सड़कों पर दौड़ते गिग वर्कर्स की जमीनी हकीकत अब भी जस की तस बनी हुई है। क्विक-कॉमर्स सेक्टर में सरकार के दखल के बाद नियम बदले जरूर हैं, पर सवाल यह उठ रहा है कि क्या इससे डिलीवरी पार्टनर्स की कामकाजी जिंदगी वाकई बेहतर होगी?
डिलीवरी बॉय का कहना है कि असली दबाव डिलीवरी टाइम से ज्यादा कमाई के सिस्टम का है। उनकी आमदनी का बड़ा हिस्सा इंसेंटिव और रोजाना पूरी की गई डिलीवरी की संख्या पर निर्भर करता है। ऐसे में भले ही 10 मिनट में ऑर्डर पहुंचाने की औपचारिक बाध्यता खत्म हो गई हो, लेकिन ज्यादा ऑर्डर जल्दी-जल्दी पूरे करने का मानसिक और शारीरिक दबाव अब भी बना हुआ है।
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लंबा काम, सीमित कमाई
कई गिग वर्कर्स बताते हैं कि 12 से 15 घंटे काम करने के बाद भी रोज की कमाई 1500 रुपये के आसपास सिमट जाती है। पश्चिम दिल्ली में काम कर रहे एक युवा डिलीवरी पार्टनर के मुताबिक, दिनभर में 35 से 40 डिलीवरी पूरी किए बिना ठीक-ठाक आमदनी संभव नहीं है। यही वजह है कि वे अक्सर थकान, ट्रैफिक और खराब मौसम के बावजूद काम करने को मजबूर होते हैं।
इंसेंटिव बना मजबूरी
इंसेंटिव सिस्टम को डिलीवरी पार्टनर्स सबसे बड़ी समस्या मानते हैं। कंपनियां भले ही कहती हों कि किसी तय समय में डिलीवरी का दबाव नहीं है, लेकिन इंसेंटिव पाने के लिए तय संख्या में ऑर्डर पूरे करना जरूरी होता है। इस होड़ में कई बार वर्कर्स ट्रैफिक नियमों को नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे सड़क हादसों का खतरा बढ़ जाता है। उनका कहना है कि इंसेंटिव की शर्तें इतनी सख्त हैं कि रफ्तार कम करने का मतलब सीधा नुकसान है।
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हड़ताल से उठी आवाज
बीते दिनों क्रिसमस और नए साल से पहले कई शहरों में गिग वर्कर्स ने काम बंद कर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। उनकी मांगें साफ थीं- न्यूनतम वेतन की गारंटी, बीमा कवर और स्थायी सामाजिक सुरक्षा। साथ ही यह भी शिकायत रही कि इंसेंटिव पॉलिसी बिना सूचना बदली जाती है, जिससे उनकी मासिक कमाई का हिसाब पूरी तरह बिगड़ जाता है।
राहत भी, चिंता भी
कुछ शहरों, खासकर बेंगलुरु में, 10 मिनट डिलीवरी खत्म होने से डिलीवरी पार्टनर्स को थोड़ी राहत महसूस हो रही है। उनका कहना है कि अब हर ऑर्डर जानलेवा दौड़ जैसा नहीं लगता। वहीं मुंबई, लखनऊ और अन्य शहरों में कई वर्कर्स को डर है कि अगर ऑर्डर की संख्या घटी तो उनकी कमाई और कम हो सकती है।
कुल मिलाकर, क्विक-कॉमर्स कंपनियों के दावों में बदलाव जरूर आया है, लेकिन गिग वर्कर्स की असल चुनौती अब भी बनी हुई है। जब तक कमाई का मॉडल, इंसेंटिव सिस्टम और सामाजिक सुरक्षा में ठोस सुधार नहीं होता, तब तक 10 मिनट की डिलीवरी खत्म होना उनके लिए सिर्फ एक आंशिक राहत ही साबित होगी।
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