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रेलू राम परिवार हत्याकांड: दोषियों की रिहाई के बाद खौफ में परिजन, रातभर पहरा; कोठी पर पुलिस की तैनाती

Reluram murder case

Reluram murder case

हिसार (हरियाणा)। बरवाला क्षेत्र में 24 साल पुराने रेलू राम पूनिया हत्याकांड ने एक बार फिर लोगों के ज़ेहन में डर की परछाईं लौटा दी है। इस जघन्य सामूहिक हत्या के दोषी सोनिया और संजीव के जेल से बाहर आने के बाद रेलू राम के भतीजे और अन्य परिजन भय के साए में जीने को मजबूर हैं। हालात ऐसे हैं कि परिवार के सदस्य पूरी रात बारी-बारी से जागकर निगरानी कर रहे हैं। एहतियातन कोठी पर पुलिस की पीसीआर भी तैनात की गई है।

परिजनों का कहना है कि सुरक्षा के बावजूद मन में आशंका बनी हुई है। किसी अनजान व्यक्ति की आहट तक से घबराहट हो जाती है। उन्हें डर है कि संपत्ति विवाद के चलते दोषी दोबारा हमला कर सकते हैं। यही वजह है कि घर के बाहर और भीतर हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है।

दोषियों की रिहाई के बाद गांव में भी बेचैनी साफ देखी जा सकती है। ग्रामीणों का कहना है कि भले ही इस घटना को दो दशक से ज्यादा समय बीत चुका हो, लेकिन कोठी के पास से गुजरते ही उस रात की भयावह तस्वीरें आंखों के सामने तैर जाती हैं। गांव वालों के अनुसार जिस तरह बच्चों तक की नृशंस हत्या की गई थी, वह आज भी लोगों को झकझोर देती है। उनका मानना है कि ऐसे लोग समाज के लिए खतरा हैं।

रेलू राम पूनिया बरवाला विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक रह चुके थे। लितानी मोड़ के पास स्थित उनकी कोठी वर्ष 1992 में खेतों के बीच बनाई गई थी। ग्रामीण उन्हें एक जनसेवी नेता के रूप में याद करते हैं, जो बिना किसी भेदभाव के लोगों की मदद करते थे। आज भी गांव के बुजुर्ग उनके व्यवहार और सादगी की मिसाल देते नहीं थकते।

23 अगस्त 2001 की रात रेलू राम पूनिया, उनकी पत्नी कृष्णा, बेटी प्रियंका, बेटे सुनील, बहू शकुंतला और तीन मासूम बच्चों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। जांच में सामने आया कि इस सामूहिक हत्याकांड के पीछे संपत्ति हड़पने की साजिश थी, जिसे बेटी सोनिया और दामाद संजीव ने अंजाम दिया। हत्या के बाद पोस्टमार्टम भी उसी कोठी में कराया गया, जहां खून से सनी लाशें पड़ी थीं।

रेलू राम के भतीजे जितेंद्र पूनिया का कहना है कि दोषियों को मिली राहत परिवार के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। उन्होंने बताया कि जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी की जा रही है, ताकि परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

ग्रामीणों का कहना है कि रेलू राम अक्सर कहते थे— “जब भी जरूरत हो, कीकर के नीचे बैठा मिलूंगा।” आज वह कीकर और उनकी यादें तो हैं, लेकिन इंसाफ का डर अब भी गांव की हवा में तैर रहा है।

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