हिमाचलः धर्मशाला के विधायक सुधीर शर्मा के समर्थन में भाजपा कार्यकर्ताओं और स्थानीय जनता ने एकजुट होकर प्रदेश की कांग्रेस सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद की। भाजपा धर्मशाला मंडल की ओर से राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन में सुधीर शर्मा से संबंधित दर्ज FIR को लेकर निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच की मांग की गई। ज्ञापन में आरोप लगाया गया कि पूरे घटनाक्रम की राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए राजनीतिक प्रतिशोध की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कार्यकर्ताओं ने कहा कि धर्मशाला की जनता अपने निर्वाचित विधायक के साथ मजबूती से खड़ी है। कांग्रेस सरकार यह समझ ले कि एफआईआर और पुलिस कार्रवाई के भय से न तो विपक्ष की आवाज दबेगी और न ही जनता के मुद्दे उठने बंद होंगे। भाजपा का आरोप है कि सुधीर शर्मा के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने और उसके बाद सरकार की नीतियों के खिलाफ मुखर होने की राजनीतिक पृष्ठभूमि में उनके विरुद्ध लगातार कानूनी एवं प्रशासनिक कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध की गंभीर आशंका पैदा करती है।
भाजपा कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया कि क्या हिमाचल में अब सरकार की आलोचना करना अपराध हो गया है? क्या एक निर्वाचित विधायक को सरकार से सवाल पूछने के बदले पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा? क्या विपक्ष के नेताओं को मुकदमों में उलझाकर सरकार अपनी जवाबदेही से बचना चाहती है? ज्ञापन में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि का सरकार की नीतियों, प्रशासनिक कार्यप्रणाली और जनहित के विषयों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल तत्व है। इसमें संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के संदर्भ में कानून के समक्ष समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विधिसम्मत प्रक्रिया का मुद्दा भी उठाया गया है।
कार्यकर्ताओं ने कहा कि वे किसी जांच से भागने या किसी संस्था की वैधानिक कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप की मांग नहीं कर रहे हैं। उनकी मांग केवल इतनी है कि जांच निष्पक्ष, स्वतंत्र, पारदर्शी और किसी भी राजनीतिक अथवा प्रशासनिक दबाव से मुक्त हो। दोनों एफआईआर में लगाए गए आरोपों, उपलब्ध साक्ष्यों और पूरे घटनाक्रम की परिस्थितियों का वस्तुनिष्ठ परीक्षण किया जाए तथा यह भी जांचा जाए कि एफआईआर दर्ज कराने अथवा जांच प्रभावित करने में किसी राजनीतिक, प्रशासनिक या बाहरी व्यक्ति का दबाव अथवा हस्तक्षेप तो नहीं रहा।
कार्यकर्ताओं ने मांग की कि यदि निष्पक्ष जांच में यह सामने आता है कि एफआईआर या उसके आधार पर की गई कार्रवाई राजनीतिक द्वेष, दुर्भावना, दबाव अथवा तथ्यहीन आरोपों पर आधारित है तो कानून के अनुसार उसे समाप्त कराने की आवश्यक कार्रवाई की जाए। साथ ही जांच को राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव से पूरी तरह मुक्त रखा जाए और आवश्यकता होने पर किसी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष उच्चस्तरीय एजेंसी अथवा अधिकारी से जांच कराने पर विचार किया जाए।
कांग्रेस सरकार से पूछा—कानून सबके लिए समान है या विपक्ष के लिए अलग?
भाजपा कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि लोकतंत्र सरकार की सुविधा से नहीं, संविधान और कानून से चलता है। सत्ता में बैठे लोगों को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वे अपने राजनीतिक विरोधियों को पुलिस और जांच एजेंसियों के माध्यम से दबाएं। ज्ञापन में राज्यपाल से दोनों एफआईआर पर विस्तृत तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब करने और जांच में राजनीतिक दबाव या कानून के दुरुपयोग के तथ्य सामने आने पर संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया है।
उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेस सरकार को अपनी कार्रवाई की निष्पक्षता पर भरोसा है तो उसे स्वतंत्र जांच से डरना नहीं चाहिए। सत्ता का काम सवालों का जवाब देना है, सवाल पूछने वालों पर मुकदमे खड़े करना नहीं। लोकतांत्रिक असहमति को आपराधिक कार्रवाई के जरिए दबाने की कोई भी कोशिश प्रदेश में गलत परंपरा स्थापित करेगी।
सुधीर शर्मा ने लॉ ऑफिसर्स की भूमिका पर भी उठाए सवाल
इसी बीच विधायक सुधीर शर्मा ने राज्यपाल को अलग से दिए अपने प्रतिवेदन में प्रदेश के कुछ सेवारत राज्य विधि अधिकारियों की राजनीतिक गतिविधियों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। प्रतिवेदन में कहा गया है कि मीडिया रिपोर्टों के अनुसार हिमाचल प्रदेश कांग्रेस लीगल सेल के बैनर तले आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का नेतृत्व ऐसे पदाधिकारी ने किया जो साथ ही प्रदेश सरकार में Additional Advocate General का सार्वजनिक पद भी संभाल रहे हैं, जबकि इसमें अन्य सेवारत Additional Advocate General और Deputy Advocate General के शामिल होने की भी बात कही गई है। शर्मा ने इसे राज्य के विधि अधिकारियों की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और संस्थागत विश्वसनीयता से जुड़ा विषय बताते हुए राज्यपाल के हस्तक्षेप की मांग की है।
सुधीर शर्मा ने राज्यपाल से राज्य सरकार से तत्काल रिपोर्ट मांगने, सेवारत Additional Advocate General और Deputy Advocate General की राजनीतिक दल की गतिविधियों में भागीदारी उनके नियुक्ति नियमों और सरकारी नीति के अनुरूप है या नहीं इसकी जांच कराने तथा राज्य के विधि अधिकारियों के कार्यालय की स्वतंत्रता और तटस्थता बनाए रखने के लिए आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने का आग्रह किया है।
उन्होंने यही मामला मुख्य सचिव, हिमाचल प्रदेश सरकार के समक्ष भी उठाया है। मुख्य सचिव को दिए प्रतिवेदन में उन्होंने समयबद्ध जांच की मांग करते हुए पूछा है कि क्या सेवारत Additional Advocate General और Deputy Advocate General का किसी राजनीतिक दल की आधिकारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेना उनकी नियुक्ति की शर्तों अथवा लागू सरकारी नीति का उल्लंघन है और यदि उल्लंघन स्थापित होता है तो संबंधित अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की जाएगी।
भाजपा कार्यकर्ताओं ने कहा कि यही सबसे बड़ा सवाल है—एक तरफ सरकार के संवैधानिक एवं सार्वजनिक पदों पर बैठे विधि अधिकारियों की राजनीतिक गतिविधियों को लेकर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं और दूसरी तरफ विपक्ष के विधायक के खिलाफ एफआईआर और जांच की कार्रवाई आगे बढ़ रही है। सरकार को आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर दोनों मामलों में पारदर्शिता दिखानी चाहिए।
कार्यकर्ताओं ने कहा कि धर्मशाला की जनता ने सुधीर शर्मा को अपना प्रतिनिधि चुनकर विधानसभा भेजा है और उनके जनप्रतिनिधि होने के संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा आवश्यक है। ज्ञापन में भी स्पष्ट किया गया है कि उद्देश्य किसी पुलिस अथवा जांच एजेंसी की वैधानिक कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कानून का शासन सर्वोपरि रहे और आपराधिक कानून राजनीतिक प्रतिशोध का साधन न बने।
कार्यकर्ताओं ने चेताया कि राजनीतिक लड़ाई राजनीतिक मैदान में लड़ी जाए, पुलिस थानों और एफआईआर के सहारे नहीं। धर्मशाला की जनता लोकतांत्रिक अधिकारों पर किसी प्रकार का प्रहार स्वीकार नहीं करेगी और सुधीर शर्मा के खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध की आशंका से जुड़े हर कदम का लोकतांत्रिक तरीके से मजबूती से विरोध करेगी।
📍 Location: शिमला (शिमला)

