शिमला। ऊना भारतीय जनता पार्टी प्रदेश सचिव सुमीत शर्मा ने मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू की वित्तीय नीतियों पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया कि वह हिमाचल प्रदेश के इतिहास में सबसे अधिक कर्ज लेने वाले और वित्तीय कुप्रबंधन वाले मुख्यमंत्री बनते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि 31 जनवरी 2026 तक बकाया ऋण ₹1,01,863 करोड़ पहुंच चुका था। अभी तक का ऋण 1.10 लाख करोड़ पार कर चुका है।
सुमीत ने बताया कि हाल ही में विधानसभा सत्र में प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खु ने लिखित जानकारी देते हुए बताया कि पिछले तीन वित्तीय वर्ष में उनकी सरकार ने 35,555 करोड़ रुपये का नया ऋण उठाया है। मायने जनता त्रस्त है और मुख्यमंत्री सहित उनके मित्र मस्त हैं।
सुमीत ने आंकड़ों सहित सरकार पर प्रहार करते हुए कहा कि ये आंकड़े प्रदेश की आर्थिक स्थिति की गंभीर तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। सवाल यह है कि इतनी बड़ी उधारी लेने के बावजूद हिमाचल की जनता को मिला क्या? कितने नए उद्योग लगे, कितने बड़े अस्पताल बने, कितने नए शिक्षण संस्थान खुले, कितने स्थायी रोजगार पैदा हुए और कितनी महिलाओं को समाजिक योजना के तहत 1500 प्रति महीना आर्थिक लाभ दिया और किसान की आय को बढ़ाने के लिए कहाँ दूध कहे हुए दाम पर खरीदा यही नहीँ आधारभूत ढांचा सड़क निर्माण और रखरखाव के लिए कौन से विकास कार्य शुरू किए और प्रदेश की आय बढ़ाने वाली कितनी नई परिसंपत्तियां खड़ी हुईं?
सुमीत ने कहा कि कर्ज लेने की रफ्तार चालू वित्त वर्ष में भी नहीं रुकी। जुलाई 2026 तक सरकार 2,800 करोड़ रुपये का ऋण उठा चुकी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार की आर्थिक नीति “कर्ज लो,मित्रों को लाभ दो और अगली पीढ़ी पर बोझ छोड़ जाओ” बनकर रह गई है।
सुमीत ने कहा कि सरकार यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती कि पुराना कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज लेना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री स्वयं यह तर्क दे चुके हैं कि पूर्व सरकार से मिले ऋण की किस्तें चुकाने के लिए वर्तमान सरकार को नया ऋण उठाना पड़ रहा है। लेकिन इससे यह सवाल समाप्त नहीं होता कि प्रदेश की आय बढ़ाने और कर्ज पर निर्भरता घटाने के लिए सरकार ने क्या ठोस कदम उठाए।
सुमीत ने कहा कि हिमाचल की जनता के नाम पर लिया गया प्रत्येक रुपया जनता का दायित्व है। आज लिया गया ऋण आने वाली सरकारों और प्रदेश की भावी पीढ़ियों को ब्याज सहित चुकाना पड़ेगा। प्रदेश सचिव ने कहा कि कांग्रेस सरकार को आंकड़ों से भागने के बजाय जनता को हिसाब देना चाहिए—इतना कर्ज लेने के बाद हिमाचल को आखिर मिला क्या?
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