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हिमाचल के संरक्षित जंगलों में फिल्म शूटिंग, ड्रोन उड़ाना और फोटोग्राफी हुई महंगी

शिमला: हिमाचल प्रदेश सरकार ने संरक्षित जंगलों, राष्ट्रीय उद्यानों और जंगली जीवों के संरक्षण वाले क्षेत्रों में फिल्म शूटिंग, ड्रोन उड़ाने, प्रोफेशनल फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और शोध कार्य को लेकर नियमों में बड़ा बदलाव किया है। सरकार ने हिमाचल प्रदेश जंगली जीव संरक्षण संशोधन नियम, 2026 अधिसूचित करते हुए विभिन्न गतिविधियों के लिए नई शुल्क दरें लागू कर दी हैं। अब इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की व्यावसायिक शूटिंग, ड्रोन संचालन, फोटोग्राफी या रिसर्च कार्य बिना पूर्व अनुमति के नहीं किया जा सकेगा। साथ ही पहले की तुलना में अधिक शुल्क भी देना होगा।

वन विभाग का कहना है कि हाल के वर्षों में हिमाचल के संरक्षित जंगलों में फिल्म शूटिंग, वेब सीरीज, सोशल मीडिया कंटेंट, ड्रोन सर्वे और प्रोफेशनल फोटोग्राफी का चलन तेजी से बढ़ा है। कई बार इन गतिविधियों से जंगली जानवरों के प्राकृतिक व्यवहार और उनके आवास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने नियमों में संशोधन कर शुल्क व्यवस्था को भी नया स्वरूप दिया है। नए नियमों के अनुसार अब फिल्म निर्माता, प्रोडक्शन हाउस, विज्ञापन एजेंसियां, डॉक्यूमेंट्री निर्माता, प्रोफेशनल फोटोग्राफर और ड्रोन ऑपरेटरों को निर्धारित शुल्क जमा कराने के बाद ही अनुमति मिलेगी।

आवेदन के साथ गतिविधि का पूरा विवरण, स्थान, अवधि और उद्देश्य भी बताना होगा। वन विभाग प्रत्येक आवेदन का परीक्षण करने के बाद ही अनुमति जारी करेगा। सरकार ने शोध कार्य करने वाले विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक संस्थानों और विद्यार्थियों के लिए भी अलग व्यवस्था की है। अनुसंधान या वैज्ञानिक अध्ययन के लिए भी अब निर्धारित शुल्क और पूर्व अनुमति आवश्यक होगी। यदि किसी शोध के दौरान जैविक नमूने एकत्र करने या विशेष अध्ययन की आवश्यकता होगी, तो उसके लिए अलग अनुमति लेनी होगी। वन विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि संवेदनशील क्षेत्रों में ड्रोन उड़ाने या कैमरों के अत्यधिक उपयोग से जंगली जीवों को होने वाले नुकसान को देखते हुए अनुमति केवल आवश्यक परिस्थितियों में ही दी जाएगी।

नियमों का उल्लंघन करने, बिना अनुमति शूटिंग करने या ड्रोन उड़ाने वालों के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी। सरकार का मानना है कि नई व्यवस्था से एक ओर पर्यावरण और जंगली जीवों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित होगी, वहीं दूसरी ओर व्यावसायिक गतिविधियों को भी पारदर्शी और व्यवस्थित तरीके से संचालित किया जा सकेगा। इससे विभाग को राजस्व भी प्राप्त होगा, जिसका उपयोग संरक्षित जंगलों और जंगली जीवों के संरक्षण पर किया जाएगा।

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