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हिमाचल हाई कोर्ट का पंचायत चुनाव को लेकर बड़ा फैसला, कहा- 30 अप्रैल से पहले कराएं Election

Himachal High Court

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हिमाचल प्रदेश डेस्क : हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने शुक्रवार को राज्य चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि पंचायती राज संस्थानों (PRI) के चुनाव जल्द से जल्द और किसी भी हाल में 30 अप्रैल से पहले करवाए जाएं। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक देरी या आपदा से संबंधित आदेशों के बहाने चुनी हुई स्थानीय निकायों को उनके पांच साल के संवैधानिक कार्यकाल से आगे जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रोमेश वर्मा की डिवीजन बेंच ने डिकेन कुमार ठाकुर और एक अन्य याचिकाकर्ता द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिकाकर्ताओं ने राज्य और राज्य चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 243-E के तहत अनिवार्य रूप से 31 जनवरी को मौजूदा कार्यकाल की समाप्ति से पहले पंचायत चुनाव कराने का निर्देश देने की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि पंचायती राज संस्थानों को पांच साल से आगे जारी रखने का कोई भी प्रयास असंवैधानिक और शुरू से ही अमान्य होगा। उन्होंने चुनाव कार्यक्रम की तत्काल अधिसूचना और बिना किसी और देरी के पूरी चुनावी प्रक्रिया को पूरा करने की भी मांग की।

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राज्य सरकार ने मुख्य सचिव द्वारा राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) के अध्यक्ष के रूप में 8 अक्टूबर, 2025 को जारी एक आदेश का हवाला देते हुए देरी को सही ठहराया था। इसमें 2025 के मानसून के दौरान व्यापक नुकसान का जिक्र किया गया था, जिसमें बादल फटने, अचानक बाढ़ और भूस्खलन शामिल थे, जिसमें 270 लोगों की जान चली गई थी और 5,400 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ था।

राज्य सरकार के अनुसार, मतदाताओं और मतदान कर्मचारियों को असुविधा से बचने के लिए सड़कों की पूरी कनेक्टिविटी बहाल होने के बाद ही चुनाव कराए जा सकते थे। इस तर्क को खारिज करते हुए, हाई कोर्ट ने कहा कि हालांकि आपदा प्रबंधन अधिनियम आपात स्थितियों से निपटने के लिए एक विशेष कानून है, लेकिन यह संवैधानिक प्रावधानों या राज्य चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय के अधिकार को खत्म नहीं कर सकता। बेंच ने कहा कि आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत जारी वैधानिक आदेश स्थानीय स्व-शासी संस्थानों के चुनावों को समय पर कराने की संवैधानिक अनिवार्यता को खत्म नहीं कर सकते।

कोर्ट ने कहा कि राज्य भर में काफी हद तक सामान्य स्थिति लौट आई है, बड़े सार्वजनिक समारोहों वाले सरकारी कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, और चुनावों को पूरी तरह से स्थगित करने को सही ठहराने के लिए रिकॉर्ड पर कोई सामग्री नहीं है। राज्य सरकार ने देरी के कारणों के रूप में लंबित परिसीमन, स्थानीय निकायों के पुनर्गठन से संबंधित अदालती मामलों और चुनाव नियमों में संशोधनों का भी हवाला दिया था। हालांकि, बेंच ने कहा कि डीलिमिटेशन एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है और इसका इस्तेमाल संवैधानिक रूप से होने वाले चुनावों को टालने के आधार के रूप में नहीं किया जा सकता। यह देखा गया कि पहले के पंचायत चुनाव भी 2011 की जनगणना के आधार पर ही कराए गए थे। इसलिए, अगर ज़रूरत हो तो मौजूदा डीलिमिटेशन के आधार पर चुनाव आगे बढ़ाए जा सकते हैं।

कोर्ट ने कई सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा किया, जिनमें किशनसिंह तोमर बनाम अहमदाबाद नगर निगम, सुरेश महाजन बनाम मध्य प्रदेश राज्य और राहुल रमेश वाघ बनाम महाराष्ट्र राज्य शामिल हैं, यह दोहराने के लिए कि स्थानीय निकायों के चुनाव उनके कार्यकाल खत्म होने से पहले पूरे होने चाहिए और प्रशासनिक या विधायी देरी इस आदेश को खत्म नहीं कर सकती।

बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि राज्य चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और राज्य सरकार का यह कर्तव्य है कि वह समय पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए उसे पूरा सहयोग दे, जिसमें स्टाफ और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट शामिल है। इसने ऐसे मामलों पर भी ध्यान दिया जिनमें कथित तौर पर ज़िला अधिकारियों ने आयोग के निर्देशों के बावजूद अधिकारियों को चुनाव सामग्री इकट्ठा न करने का निर्देश दिया था, और ऐसे आचरण को संवैधानिक प्रक्रिया के लिए नुकसानदायक बताया।

स्कूल परीक्षाओं, विधानसभा सत्रों और प्रशासनिक ज़रूरतों जैसी व्यावहारिक दिक्कतों को मानते हुए, कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि चुनावों को अनिश्चित काल के लिए टाला नहीं जा सकता। इसने राज्य चुनाव आयोग, पंचायती राज विभाग और राज्य सरकार को एक साथ बैठकर, तालमेल बिठाकर और पंचायत चुनाव तेज़ी से कराने के लिए एक ठोस रणनीति को अंतिम रूप देने का निर्देश दिया, अधिमानतः अप्रैल 2026 तक और निश्चित रूप से 30 अप्रैल, 2026 से पहले।

इन निर्देशों के साथ याचिका का निपटारा कर दिया गया, यह फिर से पुष्टि करते हुए कि जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक शासन को बहुत ही दुर्लभ परिस्थितियों को छोड़कर रोका नहीं जा सकता है और संवैधानिक समय-सीमा का अक्षरशः और भावना से सम्मान किया जाना चाहिए।

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