सोलन : हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सोलन जिले के नालागढ़ क्षेत्र में चल रही अवैध खनन गतिविधियों और स्टोन क्रशर इकाइयों द्वारा प्रदूषण नियंत्रण नियमों के उल्लंघन पर कड़ा निर्देश जारी किया है। अदालत ने पुलिस अधीक्षक सोलन और बद्दी को स्पष्ट आदेश दिया है कि अवैध खनन में लगे वाहनों के खिलाफ केवल चालान करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि खान और खनिज अधिनियम, 1957 एवं हिमाचल प्रदेश माइनर मिनरल्स रूल्स, 2015 के तहत उन वाहनों की कुर्की की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि वाहनों को केवल कड़ी शर्तों के बाद ही छोड़ा जाए।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे स्टोन क्रशर इकाइयों का मासिक आधार पर निरीक्षण सुनिश्चित करें। साथ ही, हिमाचल प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव को प्रत्येक चार महीने में क्रशर परिसर का निरीक्षण करना अनिवार्य किया गया है।
यह आदेश हंदूर पर्यावरण मित्र संस्था द्वारा दायर जनहित याचिका के निपटारे के दौरान आया। याचिका में नालागढ़ क्षेत्र में अवैध खनन, सरकारी भूमि पर अतिक्रमण और बिना अनुमति स्टोन क्रशर इकाइयों के संचालन की शिकायत की गई थी। अदालत ने याचिकाकर्ता को भविष्य में नियमों के उल्लंघन की स्थिति में पुनः याचिका दायर करने का अधिकार भी दिया।
पुलिस अधीक्षक बद्दी के हलफनामे के अनुसार, 31 जुलाई 2025 तक अवैध खनन से संबंधित 51 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं। इनमें से 32 मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं, जबकि 19 मामले अभी जांचाधीन हैं। अवैध खनन में प्रयुक्त 30 जेसीबी, 44 टिप्पर, 7 ट्रैक्टर और 2 कारें जब्त की जा चुकी हैं।
हिमाचल हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द की
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और एससी-एसटी अधिनियम के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता और पीड़िता के बीच शारीरिक संबंध सहमति से बने थे। न्यायाधीश विरेंद्र सिंह की अदालत ने स्पष्ट किया कि सहमति से स्थापित संबंध को शादी का झूठा वादा नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता विवाहिता थी और उसकी तलाक की प्रक्रिया विचाराधीन थी। केवल पीड़िता की अनुसूचित जाति से संबंधित होने का आधार अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी आधार पर विक्रम सिंह के खिलाफ दर्ज एफआईआर और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियाँ रद्द कर दी गई हैं।
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काल्पनिक पदोन्नति में वेतन विकल्प का अधिकार कर्मचारियों का
हाईकोर्ट ने वित्त विभाग के उस निर्देश को भी खारिज कर दिया जिसमें काल्पनिक (नोशनल) आधार पर दी गई पिछली तारीख वाली पदोन्नति में वेतन निर्धारण का विकल्प नहीं माना गया था। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने कर्मचारियों को स्पष्ट अधिकार दिया कि वेतन निर्धारण के लिए पे फिक्सेशन विकल्प का लाभ उठाया जा सकता है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता नरेंद्र कुमार द्वारा 18 मार्च 2019 को चुने गए विकल्प के अनुसार छह सप्ताह के भीतर सभी भुगतान और अन्य मौद्रिक लाभ दिए जाएँ। अदालत ने कहा कि पिछली तारीख से दी गई काल्पनिक पदोन्नति भी नियमित पदोन्नति की श्रेणी में आती है और इससे कर्मचारी के अधिकार कम नहीं होते।
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