Last Updated: October 22, 2026

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ढोल-नगाड़ों की थाप पर झूम उठा ढालपुर, छह दिन चलेगी राजा की जलेब

October 22, 2026

ढोल-नगाड़ों की थाप पर झूम उठा ढालपुर, छह दिन चलेगी राजा की जलेब

Kullu Dussehra: Raja’s Jaleb Begins, Six-Day Ritual Starts : कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के दूसरे दिन वीरवार को राजा की जलेब निकाली गई। ढोल-नगाड़ों की गूंज और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप के बीच राजा महेश्वर सिंह पालकी में सवार होकर ढालपुर की परिक्रमा पर निकले। भगवान नरसिंह की घोड़ी, देवी-देवताओं के रथ और हरियानों के नृत्य ने उत्सव की रौनक बढ़ा दी। सदियों पुरानी देव परंपरा के प्रतीक इस आयोजन में श्रद्धालु नाचते-गाते शामिल हुए। लंका दहन तक अगले छह दिनों में रोजाना शाम को राजा की जलेब निकाली जाएगी।

 

यह जलेब लंका दहन के दिन तक आयोजित की जाएगी और रोजाना जिला कुल्लू के विभिन्न इलाकों से आए देवी देवता इसमें शिरकत करेंगे। वही वीरवार को यह जलेब राजा के चाननी से शुरू हुई और देवी देवताओं के साथ श्रद्धालु ढालपुर में झूमते रहे। इस राजा के जलेब में भगवान नरसिंह की घोड़ी के साथ-साथ महाराज कोठी के देवताओं ने भी भाग लिया। देवता के हरियानो ने भी ढोल नगाड़ों की थाप पर नाचते गाते हुए शहर की परिक्रमा पूरी की। देवता नरसिंह की पालकी ने शहर का भ्रमण किया। ऐसे में अब आज से 6 दिनों तक रोजाना शाम को जलेब आयोजित होगी।

शाम के समय राजा की चनणी से लेकर पूरे शहर में निकली इस जलेब में दर्जनों देवी-देवता ढोल-नगाड़ों की थाप पर परिक्रमा पर निकले और लोग नाचते-गाते रहे। दशहरा उत्सव के दूसरे दिन राजा की जलेब निकली और भगवान रघुनाथ के छड़ी बरदार महेश्वर सिंह पालकी पर सवार हुए। ढालपुर में देवी-देवताओं की पुरातन संस्कृति को जिंदा रखने के लिए नरसिंह भगवान की जलेब का आगाज हुआ। अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव में आज भी सैकड़ों वर्षों पुरानी परंपरा जिंदा है और लोग इसका निर्वाह कर रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान नरसिंह को कुल्लू घाटी का रक्षक माना जाता है। ऐसे में मेले के दूसरे दिन आकर्षण का केंद्र रहने वाली नरसिंह भगवान की जलेब में भव्य नजारा देखने को मिला।

इस दौरान कुल्लू शहर वाद्य यंत्रों की ध्वनि से गूंज उठा। इस जलेब को राजा की जलेब भी कहा जाता है। क्योंकि इस जलेब में कुल्लू के राजा परंपरा के अनुसार पालकी में सज-धज कर यात्रा करते हैं। वीरवार को कुल्लू के राजा महेश्वर सिंह इस विशेष प्रकार की पालकी में बैठकर परिक्रमा पर निकले और यह जलेब छह दिनों तक चलेगी। वही, जलेब में दशहरा पर्व में भाग लेने आए सैकड़ों देवी-देवता बारी-बारी से भाग लेते हैं। इस जलेब में जहां आगे-आगे नरसिंह भगवान की घोड़ी सज धज कर चलती है। वहीं, राजा की पालकी के साथ दोनों तरफ देवता के रथ चलते हैं। यह जलेब राजा की चनणी से शुरू होती है और पूरे ढालपुर की परिक्रमा करके चनणी के पास ही समाप्त होती है।

वर्तमान में कुल्लू के राजा महेश्वर सिंह इस पालकी में बैठकर परिक्रमा कर रहे हैं। भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह ने बताया कुल्लू के राजा नरसिंह भगवान के प्रतिनिधि के रूप में पालकी में बैठकर कुल्लू शहर की सैर करते हैं। यह परंपरा भी उसी दौरान 1651 ईसवी में शुरू हुई थी। जब यहां पर भगवान रघुनाथ जी के आगमन के बाद दशहरा पर्व शुरू हुआ था। भगवान नरसिंह की जलेब चलना दशहरा पर्व में शुभ माना जाता है। उस दौरान भगवान नरसिंह की जलेब की परिक्रमा इसलिए होती थी। ताकि सुरक्षा का पूरा जायजा लिया जा सके। उन्होंने कहा कि माना जाता है कि भगवान नरसिंह इस दौरान पूरे कुल्लू शहर की किलाबंदी कर देते हैं और अपनी शक्तियों से किसी भी बुरी आत्मा को देवनगरी में प्रवेश करने नहीं देते हैं।

गौर रहे कि यह जलेब भगवान नरसिंह की मानी जाती है और राजा नरसिंह का प्रतिनिधि होने के नाते नरसिंह के रूप में इस पालकी में विराजमान होता है। यह जलेब पुराने समय में कानून व्यवस्था बनाए रखने और बुरी आत्माओं की कुदृष्टि से बचने के लिए चलती थी। यह परंपरा आज भी जीवित है। इस में जिला कुल्लू की देव संस्कृति अपनी अलग परंपरा के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है।

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