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Kullu घाटी का Ayodhya से है एक बेहद ही खास और गहरा नाता, जानिए इसके पीछे की कहानी

कुल्लूः कुल्लू घाटी का अयोध्या से एक बेहद ही खास और गहरा नाता है। जिस तरह से राम जन्म भूमि अयोध्या में रामचंद्र को माना जाता है,उसी तरह कुल्लू में इष्ट देवता ‘रघुनाथ महाराज’ माने जाते हैं। कुल्लू में रघुनाथ का एक ऐसा मंदिर है जहां पर अयोध्या से लाई हुई रामचंद्र की मूर्ति को पूजा जाता है। यहां पर रघुनाथ जी पर लोगों की अटूट आस्था है इसीलिए इस देवभूमि के सभी देवी देवता भी रघुनाथ जी को अपना इष्ट देव मानते हैं।

क्या है रघुनाथ की मूर्ती के कुल्लु आने की कहानी

देवभूमि कहीं जाने वाली कुल्लू घाटी में रघुनाथ जी की इस मूर्ति के आने की कहानी बेहद ही दिलचस्प और रोचक है। सन 1637-62 ईस्वी में तत्कालीन कुल्लू के राजा जगत सिंह के शासनकाल के दौरान उनके आदेश पर भगवान रघुनाथ की मूर्ति अयोध्या से कुल्लू लेकर आई गई थी। कुल्लू के राजघराने से संबंध रखने वाले राजा महेश्वर सिंह बताते हैं की राजा जगत सिंह के शासनकाल में उन पर ब्रह्म हत्या का दोष लग गया था। दरअसल राजा जगत सिंह को यह बताया गया था कि मणिकरण घाटी के टिपरी गांव में एक गरीब ब्राह्मण दुर्गादत्त रहता था। राजा को उस ब्राह्मण के पास सुचे मोती होने की झूठी बात किसी ने कह दी। और इस गलतफहमी के चलते राजा ने ब्राह्मण से सुचा मोती लौटाने या परिणाम होने की बात कह दी। इस गलतफहमी के चलते ब्राह्मण ने अपने परिवार को कमरे में बंद कर दिया और खुद के मांस के टुकड़े काट काट कर हवन कुंड में डालकर राजा से यह मोती ले जाने की बात कही। राजा को अपनी गलती का एहसास हो गया और अनजाने में राजा पर ब्रह्म हत्या का श्राप लग गया। इसके बाद राजा को कुष्ठ रोग हो गया खाने में खून और कीड़े दिखने लगे कई सारे वैद्य से इलाज कराने पर की कोई इलाज ना मिला।

तब फुहारी नामक एक बाबा ने राजा को अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर से रामचंद्र और सीता के मूर्ति लाकर स्थापित करने की सलाह दी। इस मंदिर में राम और सीता की वही मूर्तियां है जो स्वयं भगवान रामचंद्र ने अश्वमेध यज्ञ के लिए बनाई थी। बाबा के शिष्य दामोदरदास ने अयोध्या जाकर 1 वर्ष तक उस मंदिर में दास का काम किया और अयोध्या के सभी रीति रिवाज पूजा की विधियां सीखें। एक दिन मौका लगते ही दोनों मूर्तियों को उठाकर वे कुल्लू लेकर आने लगे। हरिद्वार के पास पहुंचने पर अयोध्या के पुजारियों ने उन्हें पकड़ लिया और मूर्तियां वापस ले जाने की कोशिश की। लेकिन मूर्तियों का चमत्कार कुछ ऐसा था की जब अयोध्या के पंडित उन्हें उठाने की कोशिश करते हैं तो मूर्ति पत्थर जितनी भारी हो जाती लेकिन जब दामोदरदास उन्हें उठाता तो फूलों जितनी हल्की होकर कुल्लू की ओर आने के लिए अग्रसर होते। यह देखते हुए अयोध्या के पंडितों ने मूर्तियों को दामोदरदास के साथ जाने की अनुमति दे दी। इन मूर्ति पहले मणिकरण कि राम मंदिर में स्थापित किया गया और इसकी पूजा अर्चना के बाद राजा जगत सिंह को अपने रोग से मुक्ति मिल गई। 1660 ईस्वी में राजा जगत सिंह द्वारा कुल्लू का यह मंदिर का निर्माण किया गया और मूर्तियों को मणिकरण से लाकर यहां पर स्थापित कर दिया गया।

क्यों सौंपा गया रघुनाथ जी को राजपाठ

मूर्तियों के चमत्कार को देखते हुए कुल्लू घाटी के सभी देवी देवताओं ने दर्शन के लिए आए । और राजा ने अपना सारा राजपाट रघुनाथ जी के चरणों पर सौंप दिया और खुद उनके छड़ी बरदार यानी कि सेवक बन गए । सभी देवी देवताओं ने भी रघुनाथ जी को अपना इष्ट मान लिया। और रघुनाथ जी कि कुल्लू आगमन के बाद से ही कुल्लू में अयोध्या की तरह ही 40 उत्सव मनाए जाते हैं और पारंपरिक तरीके से आज भी पूजा अर्चना की जाती है।

कैसी होती है रघुनाथ जी की पूजा-अर्चना

रघुनाथ मंदिर के पुजारी बताते हैं मंदिर में आज भी अयोध्या से लाई गई पूजा पद्धति के अनुसार ही रघुनाथ महाराज की पूजा अर्चना की जाती है। और यहां पर सभी त्योहार अयोध्या की तर्ज पर ही मनाए जाते हैं। दामोदर दास द्वारा अयोध्या से मूर्तियों के साथ लिख कर लायी गयी पूजा पाठ की विधि से ही आज भी यहाँ अलग अलग पहर की पूजा की जाती है। साथ ही रघुनाथ जी के लिए रोटी और दूध का बना भोग लगाया जाता है। जिसे लुच्ची कहते है। कुल्लू के लोगों में रघुनाथ जी के प्रति एक गहरी आस्था है। कुल्लू में आज भी सभी पर्व और त्योहार बाकी क्षेत्रों से अलग रघुनाथ जी से जोड़कर ही विशेष तौर पर मनाया जाता है। कुल्लू में मनाए जाने वाले दशहरा उत्सव का नाता भी रघुनाथ जी के कुल्लू आगमन से ही जुड़ा हुआ है।

जब चोरी हो गए थे श्रीराम

8 दिसंबर2014 कुल्लु के लोगों के लिये एक अंधकार भरा दिन था। इस रात रघुनाथ जी कीमूर्ति मंदिर से चोरी हो गई थी। और 9 दिसंबर की सुबह कुल्लु घाटी में ये खबर फैलते ही मातम छा गया था।जहाँ लोगों में शोक था वही कई घरों में उस दिन चूल्हा नहीं जल। साथ ही उस वर्ष उन्ही दिनों रघुनाथ मंदिर और आसपास के क्षेत्रों चित्रों में भारी बर्फबारी के कारण समस्त घाटी अंधकार में डूब गई थी।कुल्लू शहर में भी करीब 7 दिनों तक बिना बिजली के लोगों को अंधकार में रहना पड़ा। हालांकि आसपास के कई क्षेत्रों में महीने भर लोगों कोइस तरह जीवन व्यतीत करना पड़ा। इसे प्रकृति का प्रकोप कहें या फिर भगवान की लीला। हालांकि कई दिनों के सर्च ऑपरेशन के बाद 23 जनवरी 2015 को बजौरा के पास सड़क के किनारे से इस मूर्ति को रास्ते में ढंग से बरामद किया गया जय चोरों की निशानदेही पर से बरामद किया गया था।ठीक बसंत पंचमी से 1 दिन पहले श्री रघुनाथ अपने घर लौट आए थे। और कुल्लू वासियों द्वारा बेहद ही उत्साह के साथउस वर्ष बसंत मनाई गई।

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