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कुल्लू के युवा ने घर की छत पर तैयार की एवोकाडो की नर्सरी, सेब-प्लम के घटते उत्पादन के बीच दिखी नई उम्मीद

कुल्लू: हिमाचल प्रदेश में बदलते मौसम का असर पारंपरिक बागवानी पर साफ दिखाई देने लगा है। बेमौसम बारिश, बढ़ता तापमान और रोगों के कारण कई इलाकों में सेब, प्लम और अनार जैसी फसलों के उत्पादन पर असर पड़ रहा है। ऐसे में बागवान अब पारंपरिक फसलों के साथ-साथ नई और बाजार में मांग वाली फसलों की ओर भी रुख कर रहे हैं।

इसी बीच कुल्लू के एक कॉलेज छात्र ने एवोकाडो की खेती को भविष्य के विकल्प के तौर पर अपनाकर मिसाल पेश की है। कुल्लू निवासी आयुष न केवल अपने बगीचे में एवोकाडो के पौधे लगा रहे हैं, बल्कि घर की छत पर इसकी नर्सरी भी तैयार कर रहे हैं।

बदलते मौसम ने नई फसल की ओर बढ़ाया कदम

आयुष ने बताया कि मौसम में बदलाव के कारण उनके बगीचे में सेब और प्लम के पेड़ों से पहले जैसी अच्छी फसल नहीं मिल पा रही थी। इसी दौरान उन्होंने बाजार में एवोकाडो की बढ़ती मांग को देखा और इस फल की खेती करने का विचार आया।

उनके घर के आसपास पहले से कुछ पुराने एवोकाडो के पेड़ भी मौजूद थे, जिन पर बिना किसी विशेष देखभाल के ऑर्गेनिक तरीके से फल तैयार हो रहे थे। इन पेड़ों को देखकर आयुष का भरोसा और बढ़ा कि कुल्लू की जलवायु में एवोकाडो की खेती की अच्छी संभावनाएं हो सकती हैं।

विदेश से लाए गए पौधों से मिली प्रेरणा

आयुष के मुताबिक, कुल्लू के गांधीनगर क्षेत्र में रहने वाले कुछ विदेशी नागरिक कई वर्ष पहले कनाडा और न्यूजीलैंड से एवोकाडो के पौधे लेकर आए थे। इन पौधों को यहां फल देते देखकर आयुष के मन में भी बड़े स्तर पर एवोकाडो की खेती करने का विचार आया।

उन्होंने इसके बाद एवोकाडो के बीजों से पौधे तैयार करने का काम शुरू किया। इसके लिए उन्होंने लोगों से वे बीज एकत्र किए, जिन्हें आमतौर पर फल खाने के बाद फेंक दिया जाता है।

घर की छत पर तैयार हो रही 300 पौधों की नर्सरी

आयुष ने अपनी घर की छत को ही एवोकाडो की नर्सरी में बदल दिया। उनका उद्देश्य इन पौधों को कुल्लू के स्थानीय तापमान और वातावरण में तैयार करना है, ताकि पौधे यहां की परिस्थितियों के अनुकूल और मजबूत बन सकें।

फिलहाल उनकी नर्सरी में करीब 300 एवोकाडो के पौधे तैयार हो चुके हैं। वहीं, वह अब तक करीब 500 बीज एकत्र कर चुके हैं। नर्सरी में तैयार किए गए कई पौधे वह ऑनलाइन माध्यम से बेच भी चुके हैं।

अपने बगीचे में भी लगाए एवोकाडो के पौधे

आयुष ने बताया कि उन्होंने अपने बगीचे में भी एवोकाडो के कई पौधे लगाए हैं। इनमें से कुछ पौधे आने वाले समय में फल देने की स्थिति में पहुंच जाएंगे। इसके अलावा आसपास मौजूद पुराने एवोकाडो के पेड़ों से तैयार होने वाले फलों को भी वह बाजार में बेच रहे हैं।

200 से 250 रुपये किलो तक मिल रहा भाव

आयुष के अनुसार इस वर्ष बाजार में एवोकाडो की कीमत करीब 200 से 250 रुपये प्रति किलोग्राम तक रही। बाजार में इसकी मांग और अच्छे दाम को देखते हुए उन्हें उम्मीद है कि आने वाले समय में इसकी खेती किसानों और बागवानों के लिए आमदनी का बेहतर विकल्प बन सकती है।

बागवानों के लिए नई फसल की ओर बढ़ने का संदेश

आयुष का मानना है कि बदलते मौसम के दौर में बागवानों को पारंपरिक फसलों के साथ नई फसलों पर भी प्रयोग करना चाहिए। खासकर निचले इलाकों में बढ़ती गर्मी के बीच ऐसी फसलों को तलाशना जरूरी है, जो बदलती जलवायु के अनुरूप बेहतर उत्पादन दे सकें।

एवोकाडो की खेती को लेकर आयुष का यह प्रयोग युवा बागवानों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है। फेंके जाने वाले बीजों से पौधे तैयार कर उन्हें स्थानीय परिस्थितियों में विकसित करने का उनका प्रयास कम लागत में नई बागवानी की संभावनाओं को सामने लाता है।

📍 Location: Kullu (Kullu)

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