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जेल की दीवारों के भीतर बदली जिंदगी, कैदियों के बनाए उत्पाद अब खुले बाजार में बिकेंगे

शिमला : जिन हाथों ने कभी जिंदगी की राह भटककर अपराध का रास्ता चुना था, आज वही हाथ मेहनत, हुनर और आत्मविश्वास की नई इबारत लिख रहे हैं। हिमाचल की जेलों में बंद कैदी अब केवल अपनी सजा नहीं काट रहे, बल्कि अपने भविष्य को भी संवार रहे हैं। जेल की ऊंची दीवारों और लोहे की सलाखों के पीछे तैयार किए गए उनके उत्पाद अब बाजार तक पहुंचेंगे और आम लोग उन्हें खरीद सकेंगे। इसी सोच को साकार करते हुए हिमाचल प्रदेश कारागार एवं सुधारात्मक सेवाएं विभाग ने बुधवार को शिमला स्थित महालेखाकार कार्यालय परिसर में कारा डिलाइट्स बिक्त्री केंद्र शुरू किया।

यह केवल एक दुकान नहीं, बल्कि उन लोगों के जीवन में आए बदलाव की कहानी है, जिन्हें समाज अक्सर उनकी पुरानी पहचान से ही देखता है। जेल अधिकारियों का कहना है कि कारागारों में बंदियों को विभिन्न व्यावसायिक और कौशल विकास प्रशिक्षण दिए जाते हैं। कोई बढ़ईगीरी सीख रहा है, कोई हस्तशिल्प तैयार कर रहा है, तो कोई अन्य उपयोगी वस्तुएं बनाकर आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहा है। इन उत्पादों को अब बाजार मिलने से उनके हुनर को नई पहचान मिलेगी।

दरअसल, कारागार विभाग पिछले कुछ वर्षों से जेलों को केवल बंदीगृह नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। इसके तहत कैदियों को रोजगारपरक गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है ताकि जेल से बाहर निकलने के बाद वे सम्मानजनक जीवन जी सकें। इस पहल का असर आंकड़ों में भी दिखाई दे रहा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान जेल उद्योगों से जुड़े बंदियों को 3.12 करोड़ रुपये की मजदूरी का भुगतान किया गया। यह राशि केवल आय का साधन नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए भी सहारा बनी जिनके सदस्य जेल में हैं।

कारागार विभाग का मानना है कि जब किसी बंदी के हाथ में हुनर और रोजगार होगा, तो उसके दोबारा अपराध की दुनिया में लौटने की संभावना भी कम होगी। यही वजह है कि अब जेलों के भीतर तैयार उत्पादों को बड़े बाजार से जोडऩे की कोशिश की जा रही है। महालेखाकार कार्यालय परिसर में खुले कारा डिलाइट्स केंद्र को भी इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है। यहां बिकने वाला हर उत्पाद केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि किसी बंदी के बदलते जीवन, उसके प्रयास और समाज में सम्मानजनक वापसी की उम्मीद का प्रतीक होगा। कारागार विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सजा का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार का अवसर देना भी है। यदि कोई व्यक्ति अपनी गलती से सीखकर नई शुरुआत करना चाहता है तो समाज को भी उसे अवसर देना चाहिए।

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