हिमाचल डेस्कः छोटी काशी के नाम से विख्यात मंडी सोमवार से देवी-देवताओं के आलौकिक मिलन और श्रद्धा के महाकुंभ का साक्षी बनने जा रहा है। इस महोत्सव में समूचे जनपद के 216 देवी-देवता अपनी उपस्थिति दर्ज करवाएंगे। भव्य देव समागम का शुभारंभ उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री करेंगे। अब तक 170 देवी-देवता मंडी पहुंच चुके हैं।
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महोत्सव की शुरुआत राजदेवता माधोराय की पहली शाही जलेब (शोभायात्रा) से होगी। जलेब को देखने के लिए मंडी की सड़कों पर भारी जनसैलाब उमड़ने की संभावना है। पारंपरिक वाद्य यंत्रों—ढोल-नगाड़ों, करनाल और नरसिंगों—की गूंज के बीच जब माधोराय की पालकी निकलेगी, तो पूरी छोटी काशी देवमय हो उठेगी। इस दौरान पुलिस और होमगार्ड की टुकड़ियां भी कदमताल करती हुई शोभायात्रा की शोभा बढ़ाएंगी।
आराध्य देव कमरूनाग पहुंच चुके हैं मंडी
मंडी जनपद के आराध्य एवं वर्षा के देवता बड़े देव कमरूनाग अपने लाव-लश्कर के साथ मंडी पहुंच चुके हैं। परंपरा के अनुसार उन्होंने टारना माता मंदिर की पहाड़ी पर डेरा जमा लिया है। देव कमरूनाग के आगमन के साथ ही समूचे क्षेत्र में उत्सव का माहौल बन गया है।
छह सांस्कृतिक संध्याएं होंगी
महोत्सव के दौरान 16 से 21 फरवरी तक ऐतिहासिक सेरी मंच पर छह सांस्कृतिक संध्याओं का आयोजन किया जाएगा। इनमें देश-विदेश के कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे। इस दौरान एक भव्य अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक परेड भी निकाली जाएगी, जिसमें विभिन्न देशों की संस्कृति की झलक देखने को मिलेगी। उभरते गायकों के लिए ‘वॉइस ऑफ शिवरात्रि’ प्रतियोगिता का आयोजन भी होगा, जो स्थानीय प्रतिभाओं को एक बड़ा मंच प्रदान करेगा।
मंडी छोटी काशी क्यों?
जिस प्रकार वाराणसी भगवान शिव की नगरी के रूप में प्रसिद्ध है और वहां असंख्य मंदिर हैं, उसी प्रकार मंडी में भी प्राचीन मंदिरों की भरमार है। मंडी शहर में 81 से अधिक प्राचीन मंदिर हैं, जिनमें से अधिकांश भगवान शिव को समर्पित हैं, जिससे यह एक प्रमुख शैव केंद्र के रूप में जाना जाता है। वाराणसी गंगा के तट पर स्थित है, जो उसे विशेष पवित्रता प्रदान करती है। ठीक उसी प्रकार मंडी शहर ब्यास नदी के किनारे बसा हुआ है। नदी तट पर बने घाटों और मंदिरों की कतारें यहां के वातावरण को बनारस की झलक प्रदान करती हैं।
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