Special Lecture Highlights Literary Nationalism : शिमला। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में ‘कलम बनी हथियार : भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और हिंदी साहित्य’ विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया।
महाराष्ट्र के धुले स्थित विद्यावर्धिनी महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं उप-प्राचार्य प्रो. योगेश गोकुल पाटिल ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी साहित्य की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साहित्य ने जनजागरण, राष्ट्रीय चेतना और देशप्रेम की भावना को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता महाराष्ट्र के धुले स्थित विद्यावर्धिनी महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं उप-प्राचार्य प्रो. योगेश गोकुल पाटिल रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. भवानी सिंह ने की। व्याख्यान का आयोजन प्रातः 11 बजे अध्ययन कक्ष-203 में किया गया। कार्यक्रम के आरंभ में हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. भवानी सिंह ने मुख्य वक्ता प्रो. योगेश गोकुल पाटिल एवं उनकी धर्मपत्नी का स्वागत एवं अभिनंदन किया। कार्यक्रम का संचालन विभाग की छात्रा साक्षी ने किया।
अपने व्याख्यान में प्रो. योगेश गोकुल पाटिल ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी साहित्य की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि साहित्य ने केवल मनोरंजन के माध्यम के रूप में कार्य नहीं किया, बल्कि जनजागरण, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक जागृति के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिंदी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से स्वतंत्रता, स्वाभिमान, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक जागरण और देशप्रेम की भावना को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया।
उन्होंने हिंदी साहित्य के विभिन्न कालखंडों एवं प्रमुख रचनाकारों का उल्लेख करते हुए अमीर खुसरो, कबीरदास, भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रतापनारायण मिश्र, राधाकृष्णदास, मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी तथा रामधारी सिंह ‘दिनकर’ आदि साहित्यकारों की रचनाओं में व्यक्त राष्ट्रीय चेतना को रेखांकित किया। उन्होंने विशेष रूप से भारतेंदु युग में सामाजिक एवं राष्ट्रीय जागरण की भूमिका पर चर्चा करते हुए कहा कि भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन साहित्यकारों ने तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों को साहित्य के माध्यम से प्रभावशाली अभिव्यक्ति प्रदान की।
प्रो. पाटिल ने मैथिलीशरण गुप्त की रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना एवं अतीत के गौरव तथा माखनलाल चतुर्वेदी की प्रसिद्ध कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ में मातृभूमि के प्रति समर्पण और बलिदान की भावना को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के साहित्य में अभिव्यक्त स्वाभिमान, वीरता और राष्ट्रीय चेतना पर भी विस्तार से चर्चा की। व्याख्यान के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन और क्रांतिकारी चेतना के संबंध पर भी विचार-विमर्श हुआ।

