मंडी: ऐतिहासिक मंडी शिवरिात्र मेलों को आज भले ही अंतर्राष्ट्रीय मेलों का दर्जा प्राप्त है। लेकिन रियासतकालीन दौर में राजाओं के समय मेलों का स्वरूप अलग ही था। इस दौरान मेलों का आयोजन एक जगह न होकर अलग-अलग जगहों पर होता था, जिनमें सेरी, पड्डल में, चौहटा में भूतनाथ के प्रागंण और टारना की पहाड़ियों में मेलों का आयोजन किया जाता था। शिवरात्रि मेलों की विशेषता यह रही है कि सात दिन चलने वाले ये मेले किसी न किसी मंदिर व देवता को समर्पित रहे हैं।
जिसमें पहला मेला श्री राज माधोरायी के नाम, दूसरा मेला जगन्नाथ मंदिर पड्डल, तीसरा मेला टारना में स्थित श्यामाकाली, चौथा मेला रामचंद्र व जालपा पड्डल, पांचवां मेला सिद्धकाली, भूवनेश्वरी सेरी, छठा मेला त्रिलोकीनाथ व शीतला माता पुरानी मंडी, सातवां मेला चौहटा में स्थित बाबा भूतनाथ को समर्पित किए जाते थे। उपरोक्त मंदिरों में मेले के दौरान पूजा राजा स्वयं करता था। पड्डल में जलेब के बाद राजा, राज माधवराय के साथ वहां पर बनी चानणी में बैठते थे। रियासत के समय जलेब में राजा हाथी पर सवार हो कर जाते थे और चाणणी के आगे खेलों का प्रदर्शन होता था। जहां पड्डल में चानणी में राज माधवराय के साथ राजा बैठते थे। आज वहां राज माधवराय के साथ माता नाऊ पनाऊ की देवी अंबिका बैठ रही है।

