Last Updated: October 7, 2026

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भारत का जलवायु सच : गर्म होती धरती, ठंडी पड़ती समझ :

July 7, 2026

भारत का जलवायु सच : गर्म होती धरती, ठंडी पड़ती समझ :

India’s climate truth, Warming Earth, Cooling Understanding : भारतीय सभ्यता की नींव हमेशा प्रकृति की तय लय पर टिकी रही है। ऋतुओं का समय पर आना उतना ही निश्चित माना जाता था, जितना हर सुबह सूरज का उगना। खेतों में फसलें, नदियों का प्रवाह, त्योहारों की रौनक और आम जनजीवन मौसम के इसी भरोसे पर आगे बढ़ता था, लेकिन अब यह भरोसा डगमगाने लगा है।

मौसम का बदला मिजाज, बढ़ता संकट

प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है और मौसम के बदलते तेवर लगातार खतरे की घंटी बजा रहे हैं। साल 2026 इसकी सबसे चिंताजनक तस्वीर पेश कर रहा है। एक ओर अप्रैल–मई में देश के कई शहर 46 से 48 डिग्री सेल्सियस की झुलसा देने वाली गर्मी से तपे, हीट-स्ट्रोक ने लोगों की जान ली और बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। वहीं दूसरी ओर जुलाई की शुरुआत में मुंबई, पालघर और ठाणे में आसमान से ऐसा पानी बरसा कि सड़कें नदियों में बदल गईं, परिवहन व्यवस्था चरमरा गई और सामान्य जीवन ठहर गया। कहीं भीषण गर्मी का कहर है तो कहीं बेकाबू बारिश का प्रहार।

जलवायु परिवर्तन अब वर्तमान की हकीकत

हिमालय में भूस्खलन, मैदानी क्षेत्रों में बाढ़, तटीय इलाकों में चक्रवात और सूखा बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य नहीं, वर्तमान है। विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ), अंतरसरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (आईपीसीसी) और भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) की नवीनतम रिपोर्टें भी इसी निष्कर्ष की पुष्टि करती हैं। भारत की भौगोलिक विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी है और सबसे बड़ी संवेदनशीलता भी। उत्तर में हिमालय, दक्षिण में हिंद महासागर, विस्तृत तटीय क्षेत्र, विशाल मैदान और शुष्क भूभाग के कारण मौसम का मामूली असंतुलन भी करोड़ों लोगों को प्रभावित करता है।

चरम मौसम और बढ़ती आपदाएं

वर्ष 2026 में प्री-मानसून हीटवेव ने दिन-रात दोनों की गर्मी के रिकॉर्ड तोड़े, जबकि असमान मानसून ने कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ ला दी। वैज्ञानिक इसे चरम मौसमी घटनाओं (एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स) की बढ़ती आवृत्ति मानते हैं। कंक्रीट का अनियंत्रित विस्तार, नदी तटों पर अतिक्रमण, आर्द्रभूमियों का विनाश और अवैज्ञानिक शहरी नियोजन ने प्राकृतिक आपदाओं को मानवीय त्रासदी बना दिया है। आज अधिकांश आपदाएं प्रकृति से अधिक हमारी विकास नीतियों का परिणाम हैं। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार हीटवेव की अवधि और तीव्रता बढ़ रही है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन डगमगाने लगा है।

कृषि और खाद्य सुरक्षा पर खतरा

जलवायु असंतुलन का सबसे गहरा प्रभाव कृषि पर पड़ रहा है, क्योंकि भारत की बड़ी आबादी आज भी मानसून पर निर्भर है। अनिश्चित वर्षा, बढ़ता तापमान, घटती मिट्टी की नमी और प्राकृतिक आपदाएं पारंपरिक खेती को कमजोर कर रही हैं। वर्ष 2015–2021 के बीच अतिवृष्टि से 33.9 मिलियन हेक्टेयर और सूखे से लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई। वर्ष 2026 में एल-नीनो और मानसून की देरी ने खरीफ उत्पादन की चिंता बढ़ा दी। फसल चक्र बिगड़ रहे हैं, पारंपरिक बीज कम प्रभावी हो रहे हैं और सिंचाई लागत बढ़ रही है। इसका असर किसानों की आय से आगे बढ़कर खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

जलवायु संकट की बढ़ती मानवीय कीमत

यदि यह स्थिति बनी रही, तो कृषि संकट आर्थिक ही नहीं, सामाजिक अस्थिरता का कारण बनेगा। इसलिए जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय मुद्दा मानना उसकी गंभीरता को कम करके आंकना होगा। जलवायु परिवर्तन का गंभीर प्रभाव स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। तीव्र गर्मी हीट-स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और हृदय रोग बढ़ा रही है, जबकि बाढ़ के बाद मलेरिया, डेंगू और जलजनित बीमारियां फैल रही हैं। बढ़ता तापमान और वायु प्रदूषण श्वसन रोगों को और गंभीर बना रहे हैं। बच्चे, बुजुर्ग, निर्माण श्रमिक, खेतिहर मजदूर और खुले में काम करने वाले लोग सबसे अधिक जोखिम में हैं।

स्वास्थ्य और विकास पर दोहरी मार

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) चेतावनी दे चुका है कि आने वाले दशकों में जलवायु परिवर्तन सार्वजनिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में होगा। वर्ष 2026 की भीषण गर्मी में बिजली की रिकॉर्ड मांग और बिजली संकट ने इस चुनौती को और गहरा किया। भारत जैसे देश में यह केवल स्वास्थ्य नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा का भी प्रश्न है। आर्थिक दृष्टि से भी जलवायु परिवर्तन विकास की गति पर सीधा प्रहार कर रहा है। बाढ़, सूखा, चक्रवात और भूस्खलन हर वर्ष अरबों रुपये की सार्वजनिक-निजी संपत्ति नष्ट कर रहे हैं।

अर्थव्यवस्था पर बढ़ता जलवायु संकट

सड़कें, पुल, रेलमार्ग, बिजली व्यवस्था और औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखलाएं बार-बार बाधित हो रही हैं। राहत और पुनर्वास पर सरकारी व्यय बढ़ रहा है, जबकि उत्पादन और श्रम क्षमता घट रही है। विश्व बैंक और आईएमएफ भी इसे केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा मानते हैं। 2021 में हीट-स्ट्रेस से लगभग 159 अरब डॉलर की आर्थिक क्षति का अनुमान था, जबकि 2024-26 के अनुमानों में यह लगभग 194 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है। घटती उत्पादकता, श्रम घंटों की हानि और बढ़ते बीमा दावे बताते हैं कि यदि जलवायु संकट पर समय रहते नियंत्रण नहीं पाया गया, तो विकास की पारंपरिक अवधारणा भी बदलनी पड़ेगी।

हरित भविष्य की ओर भारत के कदम

इन चुनौतियों के बीच यह भी सच है कि भारत ने भविष्य की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य, सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार, हरित हाइड्रोजन मिशन, इलेक्ट्रिक वाहन नीति, जैव ईंधन को बढ़ावा और वृक्षारोपण अभियान इसी प्रतिबद्धता के प्रमाण हैं। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका और आपदा पूर्व चेतावनी प्रणालियों का सुदृढ़ीकरण भी उल्लेखनीय है। फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। वैज्ञानिक शहरी नियोजन, प्रभावी जल निकासी, जल और वन संरक्षण, आर्द्रभूमियों की सुरक्षा तथा स्थानीय स्तर पर जलवायु-अनुकूल विकास मॉडल को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना ही इस संकट का स्थायी समाधान है।

जलवायु संकट पर निर्णायक कार्रवाई जरूरी

असल प्रश्न यह नहीं है कि भारत जलवायु आपातकाल घोषित करेगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम प्रकृति की लगातार चेतावनियों को समय रहते समझ पाएंगे। विकास और पर्यावरण को विरोधी मानने की सोच अब स्वयं विकास के लिए बाधा बन चुकी है। यदि नीति-निर्माण वैज्ञानिक शोध, विश्वसनीय आंकड़ों और स्थानीय अनुभव पर आधारित हो, तो यही संकट नवाचार और सतत विकास का अवसर बन सकता है। अन्यथा चरम मौसम की घटनाएं हर वर्ष नई सुर्खियां बनेंगी और उनके पीछे छिपा आर्थिक, सामाजिक और मानवीय संकट स्थायी होता जाएगा। बदलते मौसम का सच स्पष्ट है—जलवायु परिवर्तन पर निर्णायक, वैज्ञानिक और सामूहिक कार्रवाई अब केवल पर्यावरण की नहीं, बल्कि भारत के सुरक्षित और सतत भविष्य की अनिवार्य शर्त है।
-प्रो. आरके जैन

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