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जन्मदिवस विशेष : टूटते समाज की शिराओं में बहता धर्म भगवान परशुराम

bhagwan parsuram

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अंबाला। जब समय की धड़कनें असंतुलन की ओर झुकने लगती हैं, जब धर्म केवल ग्रंथों के शब्दों में सीमित होकर रह जाता है और अधर्म सत्ता के सिंहासन पर बैठकर निरंतर मानवता को कुचलने लगता है—तब इतिहास अपने भीतर से एक ऐसी अद्भुत शक्ति को जन्म देता है जो युगों की दिशा को बदल देने की क्षमता रखती है। परशुराम उसी दिव्य शक्ति के प्रतीक हैं।

जागृत चेतना का साक्षात स्वरूप

भगवान परशुराम न केवल ऋषि-पुत्र हैं, न केवल एक महान योद्धा—वे उस जागृत चेतना का साक्षात स्वरूप हैं जो अन्याय और अत्याचार के सामने कभी भी मौन या निष्क्रिय नहीं रहती। परशुराम जयंती केवल एक स्मरण दिवस नहीं, बल्कि गहन आत्ममंथन का अवसर है कि क्या आज भी समाज में अन्याय के विरुद्ध वही प्रखर अग्नि जीवित है या फिर वह केवल पौराणिक कथाओं तक ही सीमित होकर रह गई है। जब ब्रह्मांडीय संतुलन डगमगाने लगा और क्षत्रिय सत्ता के अहंकार ने ऋषियों की तपोभूमि का अपमान करना प्रारंभ किया, तब महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर एक ऐसे बालक का जन्म हुआ, जिसमें अग्नि और संयम का अद्भुत संगम था। भगवान विष्णु के अंशावतार परशुराम ने न कभी राजसी वैभव देखा, न ही विलासिता का आकर्षण—उनका पालन-पोषण एक साधारण तपोवन में हुआ।

शास्त्र और शस्त्रधारी हैं भगवान परशुराम

भगवान शिव की कृपा से प्राप्त दिव्य परशु उनके हाथों में केवल एक शस्त्र नहीं रहा, बल्कि धर्मरक्षा का शक्तिशाली प्रतीक बन गया। उनका बाल्यकाल ही यह संकेत देने लगा था कि यह साधारण बालक नहीं, बल्कि एक ऐसे युग-परिवर्तन की भूमिका है जो स्थापित व्यवस्था को गहराई से झकझोर देगा। परशुराम के जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब हैहय वंश के प्रतापी किंतु अत्यंत अहंकारी राजा कार्तवीर्य अर्जुन ने महर्षि जमदग्नि के आश्रम पर आक्रमण कर दिया। कामधेनु गाय का बलपूर्वक अपहरण किया गया, आश्रम की पवित्रता भंग की गई और ऋषि का गहरा अपमान हुआ।

राजा की हजार भुजाओं का कर दिया था अंत

जब परशुराम लौटे तो उनके भीतर वर्षों से संचित संयम की सीमा टूट चुकी थी। उन्होंने भीषण युद्ध में राजा की हजार भुजाओं का अंत कर दिया। किंतु यह संघर्ष यहीं समाप्त नहीं हुआ। प्रतिशोध की अगली लहर में उनके पिता की निर्मम हत्या कर दी गई, जिसने उनके जीवन को एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया जहां व्यक्तिगत पीड़ा और धर्मरक्षा का दायित्व एक साथ जुड़ गए। पिता की निर्मम हत्या ने परशुराम के अंतःकरण में एक ऐसा प्रचंड संकल्प प्रज्वलित किया, जिसकी गूंज इतिहास में अमिट बन गई। उन्होंने अन्यायपूर्ण क्षत्रिय सत्ता के संपूर्ण विनाश का व्रत लिया और उसे केवल घोषणा नहीं रहने दिया, बल्कि अपने अद्भुत शौर्य और अडिग कर्म से साकार कर दिखाया।

भगवान परशुराम के बारे में एक मान्यता

मान्यता है कि उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को अत्याचारी क्षत्रियों के भार से मुक्त किया। यह केवल विनाश की कथा नहीं, बल्कि एक कठोर उद्घोष था कि जब शक्ति धर्म और मर्यादा से विचलित हो जाती है, तब उसका पतन निश्चित होता है। समंतपंचक जैसे पावन स्थलों की गाथाएं इसी भीषण संघर्ष की साक्षी हैं, जहां धर्म और अधर्म के बीच निर्णायक संग्राम घटित हुआ। परशुराम केवल संहार के प्रतीक नहीं थे, वे ज्ञान, अनुशासन और शिक्षा के भी परम आचार्य थे।

महान योद्धाओं को दिया शस्त्रविद्या का ज्ञान

महाभारत काल में उन्होंने भीष्म पितामह, आचार्य द्रोण और कर्ण जैसे महान योद्धाओं को शस्त्रविद्या का गहन और दिव्य ज्ञान प्रदान किया। उनका जीवन यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वास्तविक शक्ति केवल युद्ध कौशल में नहीं, बल्कि ज्ञान के सही मार्गदर्शन, संयम और नैतिक आधार में भी निहित होती है। भगवान श्रीराम से उनका दिव्य मिलन भी अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरक प्रसंग है, जहाँ उनका प्रारंभिक क्रोध श्रीराम की मर्यादा और दिव्यता के समक्ष शांत होकर विनम्रता में परिवर्तित हो गया। यह घटना यह सिद्ध करती है कि सच्चा ज्ञान वही है जो अहंकार को भी मिटाकर उसे विनम्रता और संतुलन में बदल दे।

माता को सजा दे आज्ञकारिता का फर्ज निभाया

कर्तव्य और पितृभक्ति की कठोर परीक्षा में परशुराम का जीवन एक अद्भुत उदाहरण बन गया। एक बार उनके पिता महर्षि जमदग्नि के आदेश ने माता रेणुका के प्रति कठिन स्थिति उत्पन्न की, और परशुराम ने बिना संशय या विलंब के पिता की आज्ञा का पालन किया। यह प्रसंग उनकी अटूट कर्तव्यनिष्ठा और आज्ञाकारिता को प्रकट करता है। आगे चलकर उन्हें दिव्य वरदान प्राप्त हुआ, जिससे जीवन में संतुलन पुनः स्थापित हुआ। अंततः उन्होंने संपूर्ण पृथ्वी का दान महर्षि कश्यप को देकर स्वयं को सांसारिक मोह और बंधनों से मुक्त कर लिया तथा महेंद्र पर्वत पर गहन तपस्या में लीन हो गए। यह यात्रा उनके जीवन के संघर्षमय चरण से आध्यात्मिक शांति और वैराग्य की ओर रूपांतरण का प्रतीक है।

अन्याय के खिलाफ न्याय का शस्त्र था परसा

वर्तमान समय में परशुराम का चरित्र केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि गहरी नैतिक दिशा और जीवन-दृष्टि का प्रतीक है। वे यह संदेश देते हैं कि शक्ति का वास्तविक उद्देश्य विनाश नहीं, बल्कि धर्म और न्याय की स्थापना होना चाहिए। उनका कुल्हाड़ा मात्र एक अस्त्र नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध जाग्रत चेतना और साहस का प्रतीक है। आज के समाज में, जहाँ नैतिकता और शक्ति का संतुलन बार-बार डगमगाता दिखाई देता है, वहाँ परशुराम का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है कि क्रोध को भी धर्म की दिशा मिलनी चाहिए और ज्ञान को सदैव कर्म का आधार बनना चाहिए।
-प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

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