नागपुरः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने नागपुर में सिंधु एजुकेशन सोसाइटी के एक कार्यक्रम को संबोधित किया। अपने भाषण में उन्होंने जीवन में संघर्ष, विभाजन के समय भारत आए लोगों की स्थिति, शिक्षा के महत्व और समाज के प्रति जिम्मेदारी जैसे कई विषयों पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि जीवन में कठिन परिस्थितियां सभी के सामने आती हैं, लेकिन उनसे घबराने या हार मानने के बजाय लगातार प्रयास करते रहना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि देश के विभाजन के समय पाकिस्तान से भारत आए लोगों को “शरणार्थी” कहना सही नहीं है, क्योंकि वे अपनी मातृभूमि और अपने धर्म की रक्षा के लिए भारत आए थे।
राजनीति के बारे में क्या कहा
मोहन भागवत ने कहा कि राजनीति का स्वभाव ऐसा होता है कि यदि कोई व्यक्ति अच्छा काम करता है और आगे बढ़ता है, तो कुछ लोग उससे ईर्ष्या करने लगते हैं। उनके अनुसार, समाज में हमेशा ऐसे लोग मिलेंगे जो दूसरों की सफलता से खुश होने के बजाय जलन महसूस करेंगे। इसलिए किसी भी व्यक्ति को आलोचना या विरोध से घबराए बिना अपना अच्छा काम करते रहना चाहिए।
कठिन समय में रोने के बजाय प्रयास करना चाहिए
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि जिन लोगों ने देश के विभाजन के समय अपना घर, जमीन, कारोबार और संपत्ति सब कुछ खो दिया था, उन्होंने भी हार नहीं मानी। वे रोते हुए बैठ नहीं गए, बल्कि नई जगह पर फिर से मेहनत करके अपना जीवन शुरू किया।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को परिस्थितियों के सामने हार नहीं माननी चाहिए। कठिन समय में रोने या निराश होने के बजाय लगातार प्रयास करना चाहिए। उनका मानना है कि मेहनत करने वाला व्यक्ति देर-सबेर सफलता जरूर प्राप्त करता है। उन्होंने यह भी कहा कि जो व्यक्ति संघर्ष शुरू होने से पहले ही हार मान लेता है, वह कभी आगे नहीं बढ़ सकता। जबकि जो व्यक्ति पूरी ताकत से संघर्ष करता है, वह कुछ न कुछ उपलब्धि अवश्य हासिल करता है।
जीवन में संघर्ष से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए
मोहन भागवत ने कहा कि जीवन में कभी भी भागना या हार मानना सही रास्ता नहीं है। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भी युद्ध से भागने के बजाय अपने कर्तव्य का पालन करने की प्रेरणा दी थी। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति अपने कर्तव्य के लिए डटकर खड़ा रहता है और संघर्ष करता है, तो उसका नुकसान नहीं होता। लेकिन जो व्यक्ति डरकर पीछे हट जाता है, वह अवसर भी खो देता है और आत्मविश्वास भी। उन्होंने कहा कि जीवन में एक रास्ता बंद होता है तो दूसरा रास्ता जरूर खुलता है। इसलिए निराश होने के बजाय नए अवसरों की तलाश करनी चाहिए।
पाकिस्तान से भारत आए लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि विस्थापित थे
मोहन भागवत ने विभाजन के समय पाकिस्तान से भारत आए लोगों का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें “शरणार्थी” कहना उचित नहीं है। उनके अनुसार वे लोग अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि परिस्थितियों के कारण अपना घर छोड़कर भारत आए थे। उन्होंने कहा कि उन लोगों ने अपनी पीढ़ियों की कमाई, जमीन, व्यापार, खेती और संपत्ति सब कुछ पीछे छोड़ दिया, क्योंकि वे ऐसे स्थान पर रहना चाहते थे जहां वे अपने धर्म और संस्कृति के अनुसार स्वतंत्र रूप से जीवन जी सकें। उनका कहना था कि वे लोग भारत को अपनी मातृभूमि मानते थे और उसी प्रेम के कारण यहां आए। इसलिए उन्हें विस्थापित कहा जा सकता है, लेकिन शरणार्थी कहना सही शब्द नहीं है।
देश और धर्म को संपत्ति से ऊपर रखा
मोहन भागवत ने कहा कि विभाजन के समय भारत आने वाले लोगों ने धन-दौलत, कारोबार और सुविधाओं के बजाय अपने देश और अपने धर्म को प्राथमिकता दी। उन्होंने कहा कि उन लोगों ने आसान जीवन नहीं चुना, बल्कि संघर्ष का रास्ता चुना। उनका उद्देश्य केवल सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जीना था। उन्होंने कहा कि उस समय भारत को एक रखने की लड़ाई हम सब हार गए, लेकिन जिन्होंने भारत को चुना, उन्होंने अपने मूल्यों और विश्वास को सबसे ऊपर रखा।
शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं होना चाहिए
शिक्षा के विषय में मोहन भागवत ने कहा कि ऐसी शिक्षा जो केवल पेट भरने या नौकरी दिलाने तक सीमित हो, वह जरूरी तो है, लेकिन जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि दुनिया में कई ऐसे लोग भी हैं जिनके पास बड़ी डिग्रियां नहीं हैं, लेकिन अपनी मेहनत और समझदारी के बल पर वे सफल बने और दूसरों को रोजगार देने लगे। उनके अनुसार शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य में विवेक, अच्छे संस्कार और सही-गलत की पहचान विकसित करना है।
बच्चे की पहली शिक्षक उसकी मां होती है
मोहन भागवत ने कहा कि शिक्षा की शुरुआत स्कूल से नहीं, बल्कि घर से होती है। उन्होंने कहा कि बच्चे की पहली और सबसे महत्वपूर्ण शिक्षक उसकी मां होती है, जो उसे जीवन के शुरुआती संस्कार देती है। उन्होंने कहा कि परिवार से मिलने वाले संस्कार ही आगे चलकर व्यक्ति के चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
जीवन केवल अपने लिए नहीं, समाज के लिए भी होना चाहिए
अपने संबोधन के अंत में मोहन भागवत ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का एक उद्देश्य होना चाहिए। उनका मानना है कि इंसान को केवल अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि परिवार, समाज और पूरे मानव समाज के हित के लिए भी जीना चाहिए।
उन्होंने कहा कि लोगों को अच्छाई का संदेश केवल भाषण देकर नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और कर्मों से देना चाहिए। जब व्यक्ति स्वयं अच्छा आचरण करता है, तभी उसका प्रभाव समाज पर पड़ता है। यही भारतीय संस्कृति और जीवन पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता है।

