नई दिल्ली: पंजाब और हरियाणा में खेतों में पराली जलाने की 90 प्रतिशत से अधिक घटनाएं अब आधिकारिक निगरानी प्रणालियों की पकड़ में नहीं आ रही हैं क्योंकि किसान खेतों में कृषि अपशिष्ट दोपहर बाद जलाते हैं। यह खुलासा सोमवार को प्रकाशित एक विश्लेषण आधारित अध्ययन रिपोर्ट में हुआ है। इंटरनैशनल फोरम फॉर इनवॉयरमैंट, सस्टेनबिलिटी एंड टैक्नोलॉजी (आईफॉरेस्ट) द्वारा जारी पराली जलाने से जुड़ी स्थिति रिपोर्ट 2025 में कहा गया है कि इस वर्ष दिल्ली के वायु प्रदूषण में पराली जलाने के योगदान को काफी कम करके आंका गया है।
आईफॉरेस्ट ने कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के अंतरिक्ष से कृषि-पारिस्थितिकी तंत्र निगरानी और मॉडलिंग पर अनुसंधान के लिए कंसोर्टयिम (सीआरईएएमएस) द्वारा संचालित सरकार का वर्तमान निगरानी प्रोटोकॉल, अधिकांश पराली जलाने की घटनाओं को दर्ज करने में असमर्थ है, क्योंकि यह मुख्य रूप से ध्रुवीय-कक्षा वाले उपग्रहों पर निर्भर करता है, जो भारत का केवल सुबह 10.30 बजे से दोपहर 1.30 बजे के बीच ही निरीक्षण करते हैं। इसमें कहा गया है कि यह अल्प अवधि है जब निगरानी की जाती है, जो किसानों द्वारा पराली जाने के समय से मेल नहीं खाती।
विश्लेषण के मुताबिक पंजाब में 2024 और 2025 में पराली जलाने की 90 प्रतिशत से ज्यादा बड़ी घटनाएं दोपहर 3 बजे के बाद घटित होंगी। 2021 में, उपग्रह अवलोकन समय के बाद केवल 3 प्रतिशत ही पराली जलाने की घटनाएं घटित हुई थीं। हरियाणा में 2019 के बाद से पराली जलाने की अधिकांश बड़ी घटनाएं दोपहर 3 बजे के बाद हुई हैं। आईफॉरेस्ट ने चेतावनी दी है कि दोपहर और शाम के समय पराली जलाने की घटनाओं की जानकारी दर्ज नहीं होने से उत्सजर्न का अनुमान लगाने और दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता के पूर्वानुमान में बड़ी त्रुटियां हो सकती हैं।
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