Last Updated: October 17, 2026

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नगर निगम चुनाव नतीजों के बाद अजित पवार के भविष्य पर सवाल, महायुति में कमजोर हुई स्थिति

January 16, 2026

नगर निगम चुनाव नतीजों के बाद अजित पवार के भविष्य पर सवाल, महायुति में कमजोर हुई स्थिति

नेशनल डेस्क: महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार को राजनीतिक दृष्टि से एक बड़ा झटका लगा है। पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ नगर निगम चुनावों में एनसीपी के उनके गुट को करारी हार का सामना करना पड़ा है। इस हार ने न केवल भाजपा को उनके गृह क्षेत्र में चुनौती देने की उनकी रणनीति को ध्वस्त कर दिया है, बल्कि महायुति गठबंधन में दबी हुई भूमिका निभाने के अलावा उनके पास कोई विकल्प भी नहीं बचा है।

अजित पवार ने एनसीपी के भीतर अपने विद्रोह के बाद से भाजपा के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे थे, खासकर उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और भाजपा के बीच लगातार होने वाले टकरावों की तुलना में। हालांकि, जब मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने घोषणा की कि भाजपा पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ चुनाव स्वतंत्र रूप से लड़ेगी तो पवार ने अपनी रणनीति बदल दी।

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पिंपरी-चिंचवाड़ में NCP का प्रभाव समाप्त

एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए उन्होंने शरद पवार के एनसीपी गुट के साथ स्थानीय गठबंधन किया। राज्य स्तर पर भाजपा का सहयोगी होने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर उनके प्रतिद्वंद्वियों के साथ गठबंधन करने की यह “दोहरी रणनीति” पूरी तरह से विफल रही। व्यापक प्रचार अभियान और मुफ्त बस और मेट्रो यात्रा जैसे बड़े-बड़े वादों के बावजूद दोनों शहरों के मतदाताओं ने अजित पवार के नेतृत्व को निर्णायक रूप से नकार दिया। पुणे में एनसीपी को करारी हार का सामना करना पड़ा। वहीं पिंपरी-चिंचवाड़ में भाजपा ने एनसीपी के प्रभाव को सफलतापूर्वक समाप्त कर दिया।

पवार को गठबंधन में शामिल करने का पछतावा- रविंद्र चव्हाण 

चुनाव प्रचार की आक्रामक शैली ने गठबंधन के साझेदारों के बीच संबंधों को खराब कर दिया है। रैलियों के दौरान, अजित पवार ने भाजपा के नेतृत्व वाली मौजूदा नगर पालिका प्रशासन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। इससे तीखी प्रतिक्रिया हुई। राज्य भाजपा अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने हाल ही में गठबंधन पर खेद व्यक्त करते हुए कहा कि पार्टी को अजित पवार को गठबंधन में शामिल करने का पछतावा है। राज्यभर में मौजूद 29 नगर निगमों में से एक में भी एनसीपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने में विफल रही है, ऐसे में महापौर पद हासिल करने की उसकी संभावनाएं न के बराबर हैं।

अजित पवार के सामने दो विकल्प

विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा अब पवार की राजनीतिक स्थिति को और कमजोर करने पर ध्यान केंद्रित कर सकती है। राजनीतिक गलियारों में अजित पवार के अगले कदम को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। फिलहाल उनके सामने दो विकल्प हैं। पहला, वे भाजपा से संबंध तोड़ने पर विचार कर सकते हैं, लेकिन राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर भाजपा की मजबूत स्थिति को देखते हुए यह एक जोखिम भरा कदम होगा।

दूसरा विकल्प यह है कि वे चुपचाप महायुति सरकार में बने रहें, लेकिन अपनी भूमिका कम कर लें और भाजपा के साये में रहकर राजनीतिक रूप से अपना अस्तित्व बनाए रखें। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए, पर्यवेक्षकों का मानना है कि उपमुख्यमंत्री बाद वाला विकल्प ही चुनेंगे, क्योंकि मौजूदा परिदृश्य में भाजपा को और चुनौती देना राजनीतिक रूप से घातक साबित हो सकता है।

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