‘महिला सशक्तिकरण की ओर बढ़ते कदम
(नारी शक्ति वंदन अधिनियम)
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 ́ एक युगांतरकारी पहल के रूप में सामने आया है। यह अधिनियम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित करता है, जो केवल प्रतिनिधित्व बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि नीति निर्माण को अधिक समावेशी, संवेदनशील और प्रभावी बनाने की दिशा में एक ठोस प्रयास है। इसका उद्देश्य महिलाओं को “नीति के लाभार्थी” से “नीति निर्माता” बनने का अवसर प्रदान करना है, जिससे वे देश के विकास की आधारशिला में सक्रिय भूमिका निभा सकें।
इस अधिनियम के लागू होने से शासन की प्राथमिकताओं में व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा । जब निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा, जल और स्वच्छता जैसे विषय अधिक प्राथमिकता प्राप्त करते हैं। स्थानीय निकायों में महिलाओं के आरक्षण के सकारात्मक अनुभव पहले ही यह साबित कर चुके हैं कि महिला नेतृत्व से नीतियां अधिक जन – केंद्रित और प्रभावी बनती हैं। अब यही प्रभाव संसद और विधानसभाओं में भी दिखाई देगा, जिससे विकास की दिशा अधिक संतुलित और समावेशी होगी ।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में पिछले एक दशक में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए किए गए प्रयासों ने इस परिवर्तन की मजबूत नींव रखी है। 22 जनवरी, 2015 को ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत की गई थी, इस अभियान से सामाजिक सोच में सकारात्मक बदलाव लाया है और लड़कियों की शिक्षा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है । सुकन्या समृद्धि योजना के तहत करोड़ों खातों के माध्यम से बेटियों के भविष्य को आर्थिक सुरक्षा मिली है। उच्च शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी इस बदलाव का स्पष्ट संकेत देती है ।
स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के माध्यम से करोड़ों महिलाओं को पोषण सहायता मिल रही है, जबकि पोषण 2.0 के तहत लाखों आंगनवाड़ी केंद्रों के जरिए करोड़ों लाभार्थियों तक सेवाएं पहुंचाई जा रही हैं। इन प्रयासों का परिणाम मातृ- मृत्यु दर में कमी के रूप में सामने आया है, जो महिला स्वास्थ्य के क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव को दर्शाता है।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी भारत में गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य को सुरक्षित बनाने के लिए संकल्पबद्ध हैं। नेशनल हेल्थ मिशन के तहत कई महत्वपूर्ण योजनाएं चलाई जा रही हैं। इनमें जननी सुरक्षा योजना एक प्रमुख योजना है, जिसका उद्देश्य संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देकर मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करना है । इस योजना के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में बीपीएल / एससी परिवारों की महिलाओं को सरकारी संस्थान में प्रसव पर 700 रुपये तथा शहरी क्षेत्रों में 600 रुपये की सहायता दी जाती है, जबकि घर पर प्रसव के लिए बीपीएल परिवारों को 500 रुपये प्रदान किए जाते हैं। इसके अलावा, राज्य योजना के तहत एससी वर्ग की गर्भवती महिलाओं को सरकारी या निजी संस्थानों में प्रसव पर 1,500 रुपये की नकद सहायता मिलती है ।
इसी प्रकार, ‘जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम’ के माध्यम से गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पतालों में पूरी तरह निःशुल्क सेवाएं दी जाती हैं, जिनमें दवाइयाँ, जांच, भोजन, रक्त की सुविधा और परिवहन शामिल हैं, जिससे इलाज पर होने वाला खर्च पूरी तरह समाप्त हो जाता है। ‘प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान’ गर्भवती महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व देखभाल प्रदान करने पर केंद्रित है। इस योजना के तहत हर महीने निर्धारित दिनों ( 9, 10, 23 तारीख और अंतिम कार्य दिवस) पर विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा जांच, स्क्रीनिंग और उपचार सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। विशेष रूप से उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं (HRP) के लिए प्रत्येक विज़िट पर 100 रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाती है, जो अधिकतम 300 रुपये तक है। ये सभी योजनाएँ मिलकर देश में मातृ स्वास्थ्य को बेहतर बनाने, सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित करने और महिलाओं को समय पर उचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं ।
देशभर में महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में एचपीवी (Human Papillomavirus) टीकाकरण अभियान शुरू किया गया है। सर्वाइकल कैंसर भारत में महिलाओं में होने वाला दूसरा सबसे आम कैंसर है, जिसका मुख्य कारण एचपीवी के उच्च – जोखिम प्रकारों से होने वाला संक्रमण है। इस गंभीर स्वास्थ्य समस्या से निपटने के लिए भारत सरकार ने एचपीवी टीकाकरण को एक प्रभावी रोकथाम उपाय के रूप में अपनाया है, जिससे भविष्य में कैंसर के मामलों को कम किया जा सके। वैश्विक स्तर पर सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन की रणनीति के तहत एचपीवी टीकाकरण को एक मजबूत स्तम्भ माना गया है। लक्ष्य रखा गया है कि वर्ष 2030 तक 15 वर्ष की आयु तक कम से कम 90 प्रतिशत लड़कियों को एचपीवी वैक्सीन दी जाए ।
इसी दिशा में, वर्ष 2026 में विशेष अभियान जो तीन महीनों की अवधि में एक विशेष राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में लागू किया जा रहा है । इस अभियान के अंतर्गत 14 से 15 वर्ष आयु वर्ग की लड़कियों को टीकाकरण के लिए पात्र माना गया है और Gardasil-4 वैक्सीन की सिंगल – डोज़ व्यवस्था अपनाई गई है। हरियाणा राज्य में लगभग 2.4 लाख किशोरियों को इस अभियान के तहत कवर करने का लक्ष्य रखा गया है। अभियान की शुरुआत के बाद से अब तक 6,500 से अधिक पात्र लाभार्थियों को टीका लगाया जा चुका है। यह पहल न केवल महिलाओं के स्वास्थ्य को सुरक्षित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि भविष्य में सर्वाइकल कैंसर के खतरे को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी ।
केन्द्र सरकार द्वारा नेशनल हेल्थ मिशन के अंतर्गत संचालित आशा (ASHA) कार्यकर्ता ग्रामीण और शहरी स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं । ये समुदाय और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच सेतु का कार्य करती हैं तथा मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण, जागरूकता और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं ।
हरियाणा में पिछले लगभग 11 वर्षों में आशा कार्यकर्ताओं की संख्या 16,861 से बढ़कर 20,623 हो गई, जिससे लगभग 4,458 नई भर्तियाँ हुईं। इसके साथ ही, उनके मानदेय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अब वर्ष 2026 में यह 14,023 रुपये प्रति माह है। साथ ही, आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन-आरोग्य योजना के तहत आशा कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों को 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवर देने की प्रक्रिया जारी है।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के कुशल नेतृत्व में भारत ने पिछले कुछ वर्षों में महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं सरकारी योजनाओं के तहत बड़ी संख्या में घर महिलाओं के नाम पर दर्ज किए गए | STEM क्षेत्रों तथा स्टार्ट-अप इको-सिस्टम में भी महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। भारत में महिलाओं की मतदान में भागीदारी लगातार बढ़ रही है । आज महिलाएं बड़ी संख्या में मतदान करती हैं और कई बार पुरुषों से अधिक मतदान प्रतिशत दर्ज करती हैं। यह इस बात का संकेत है कि महिलाएँ अब लोकतंत्र के केंद्र में आ चुकी हैं। हालाँकि, संसद और विधानसभाओं में उनकी संख्या अभी भी अपेक्षाकृत कम है। लेकिन पंचायत स्तर पर स्थिति अधिक सकारात्मक है, जहाँ लगभग 46 प्रतिशत प्रतिनिधि महिलाएँ हैं । यह दर्शाता है कि अवसर मिलने पर महिलाएँ प्रभावी नेतृत्व कर सकती हैं।
इन सभी प्रयासों ने मिलकर एक मजबूत आधार तैयार किया है, जिस पर नारी शक्ति वंदन अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन संभव होगा। जैसे-जैसे संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, वे न केवल मौजूदा योजनाओं को और प्रभावी बनाएंगी, बल्कि नई नीतियों के निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभाएंगी। इससे शासन अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी और संवेदनशील बनेगा ।
अंततः, यह अधिनियम केवल एक संवैधानिक प्रावधान नहीं, बल्कि विकसित भारत 2047′ के संकल्प को साकार करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। महिला नेतृत्व के बढ़ने से विकास की प्रक्रिया अधिक समावेशी, संतुलित और टिकाऊ बनेगी। यह पहल आने वाले समय में भारत के लोकतंत्र और विकास मॉडल को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी ।
आरती सिंह राव
स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान और आयुष मंत्री

