Last Updated: October 30, 2026

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22 साल बाद भी नाबालिग होने की दलील दी जा सकती है: इलाहाबाद हाईकोट

April 3, 2023

22 साल बाद भी नाबालिग होने की दलील दी जा सकती है: इलाहाबाद हाईकोट

लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि सुनवाई के दौरान 22 साल बाद भी नाबालिग होने की दलील दी जा सकती है। कोर्ट ने दहेज मृत्यु के समय 2000 में नाबालिग आरोपी युवती को मामले को किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) में स्थानांतरित करने के लिए संबंधित कोर्ट के समक्ष याचिका दायर करने की अनुमति दे दी है।

न्यायमूर्ति प्रकाश सिंह की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम की धारा 7 (ए) के प्रावधानों में विधायिका की मंशा स्पष्ट है, जो अभियुक्त को घटना के समय नाबालिग होने के तर्क के आधार पर प्रीट्रायल, परीक्षण और अपील की अनुमति देती है। इस अवलोकन के साथ, पीठ ने एक निचली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और याचिकाकर्त्ता से कहा कि वह उक्त कोर्ट में नाबालिग होने की अपनी याचिका दायर करे, जो अगले 45 दिनों के भीतर इस पर फैसला करेगी।

पीठ ने हाल ही में याचिकाकर्त्ता की भाभी की याचिका पर फैसला सुनाते हुए यह आदेश पारित किया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसे वर्ष 2000 के दौरान मामले में फंसाया गया था जब वह केवल 13 वर्ष की थी। सीतापुर के मुख्य न्यायिक मैजिस्ट्रेट (सीजेएम) ने मामले में उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया है। जब उसने मामले को जेजेबी को स्थानांतरित करने की मांग की, तो सीजेएम ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि याचिका 22 साल बाद आई है।

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