Last Updated: September 21, 2026

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प्रसून जोशी का प्रसार भारती काल : कवि की कलम या सरकारी रिमोट?

May 3, 2026

प्रसून जोशी का प्रसार भारती काल : कवि की कलम या सरकारी रिमोट?

नई दिल्ली। कभी-कभी एक नियुक्ति सिर्फ कुर्सी का बदलाव नहीं होती, बल्कि सोच और संवाद की धारा को मोड़ देती है। प्रसून जोशी का प्रसार भारती के चेयरमैन पद पर आगमन भी ऐसा ही एक निर्णायक पल है। यहां रचनात्मकता और शासन का संगम एक नए युग की आहट देता है।

प्रसून की नियुक्ति देती है सवाल

शब्दों से राष्ट्र की आत्मा को स्वर देने वाला यह संवेदनशील सृजनकर्ता अब दूरदर्शन और आकाशवाणी की बागडोर संभालते हुए नई कथाओं, नए विचारों और नई दिशा की पटकथा लिखने को तैयार नजर आता है। 2 मई 2026 की यह नियुक्ति सीधे प्रश्न खड़ा करती है—क्या यह पारंपरिक प्रसारण को डिजिटल युग में पुनर्जीवित कर नई प्रासंगिकता देगा या सार्वजनिक मंचों को और अधिक मुखर सरकारी आख्यान में ढालेगा? असल चुनौती यही है कि यह बदलाव सूचना की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विरासत के बीच उस सूक्ष्म संतुलन को कैसे साधता है, जिस पर लोकतंत्र की विश्वसनीयता टिकी है।

‘दाग अच्छे हैं’ से रचा सांस्कृतिक आयाम

सृजन की राह पर बढ़ते एक रचनाकार ने अपने शब्दों से युवाओं के दिलों में गहरी छाप छोड़ी है। ‘रंग दे बसंती’ और ‘चांद सिफारिश’ जैसे गीतों ने नई पीढ़ी को जोड़ा, वहीं विज्ञापन जगत में ‘ठंडा मतलब कोका-कोला’, ‘हैप्पीडेंट पैलेस’, ‘दाग अच्छे हैं’ (सर्फ एक्सेल) और ‘इनक्रेडिबल इंडिया’ जैसे अभियानों से उन्होंने सांस्कृतिक गहराई का नया आयाम रचा। उनकी अभिव्यक्ति में देशज मिट्टी की सुगंध और सांस्कृतिक चेतना का सजीव प्रतिबिंब दिखाई देता है, जो शाश्वत मूल्यों को स्पर्श करता है। आधिकारिक तौर पर उन्हें दुर्लभ रचनात्मक प्रतिभा माना गया है, जिनके नेतृत्व में संस्था को नई ऊर्जा, स्पष्ट उद्देश्य और रचनात्मक दिशा मिलने की उम्मीद है।

डिजिटल परिवर्तन की चुनौती और नए काम

यह बदलाव ऐसे समय में सामने आया है, जब संगठन डिजिटल परिवर्तन की चुनौतियों से जूझ रहा है और उसे नवाचारपूर्ण दृष्टिकोण की आवश्यकता है। बदलते मीडिया परिदृश्य में प्रसार भारती इस समय दोहरे संघर्ष से गुजर रही है। एक ओर डिजिटल प्लेटफॉर्म—नेटफ्लिक्स, यूट्यूब और इंस्टाग्राम—युवा दर्शकों को आकर्षित कर रहे हैं, तो दूसरी ओर संपादकीय स्वतंत्रता, सीमित संसाधन और राजनीतिक दबाव जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।

चाहिए रचनात्मक दृष्टि और नवाचार का समावेश

इसके बावजूद, वेव्स ओटीटी और पे-पर-व्यू जैसे प्रयोग डिजिटल-फर्स्ट सोच को दर्शाते हैं, जबकि डायरेक्ट-टू-मोबाइल ब्रॉडकास्टिंग और एआई आधारित कंटेंट निर्माण के प्रयास भविष्य की तैयारी का संकेत देते हैं। यदि रचनात्मक दृष्टि और नवाचार का सही समावेश हो, तो ग्रामीण भारत की अनकही कहानियों को वीआर/एआर के जरिए जीवंत करना, क्षेत्रीय भाषाओं में पॉडकास्ट बनाना और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच तक पहुंचाना संभव है।

उभरती संभावनाओं में आशंका का साया

इसी दिशा में शुरू किए गए ‘क्रिएटर्स कॉर्नर’ जैसे कार्यक्रम भी युवा डिजिटल क्रिएटर्स को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास दर्शाते हैं। उभरती संभावनाओं के बीच आशंकाओं का साया और गहरा दिखाई देता है, क्योंकि यह संस्था बरसों से अपनी वास्तविक स्वायत्तता के लिए जूझती रही है। हाल के वर्षों में वरिष्ठ संपादकों के क्रमशः हाशिए पर जाने, तकनीकी तंत्र के बढ़ते वर्चस्व और कंटेंट से जुड़े अधिकांश पदों के रिक्त पड़े रहने जैसी स्थितियां उसकी आंतरिक चुनौतियों को उजागर करती हैं।

केंद्र में वैचारिक समीकरण और बहस

ऐसे परिदृश्य में नेतृत्व के वैचारिक समीकरण भी स्वाभाविक रूप से बहस के केंद्र में आ खड़े होते हैं, जिससे यह सवाल और तीखा हो जाता है कि क्या आगे की राह विविध आवाजों—विपक्ष, आलोचना और क्षेत्रीय सरोकारों—को समान महत्व देगी, या ‘एक राष्ट्र, एक स्वर’ वाले नैरेटिव को और पुख्ता करेगी? विशेषकर जब देश विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों के संवेदनशील दौर से गुजर रहा है, तब इस परिवर्तन का समय अपने आप में कई गहरे संकेत और अनुत्तरित प्रश्न समेटे हुए है।

नए युग की दहलीज पर चुनौती

नए युग की दहलीज पर खड़ी इस संस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती तकनीकी नहीं, बल्कि उसकी जड़ में बैठी संरचनात्मक सीमाएं हैं, जो डिजिटल पुनर्जन्म की गति को थामे हुए हैं। बदलते समय के साथ तालमेल बिठाने के लिए क्लाउड-आधारित वर्कफ्लो, इमर्सिव प्रोडक्शन और हाइब्रिड डिलीवरी जैसे आधुनिक ढांचों की तत्काल आवश्यकता है। यदि नेतृत्व रचनात्मक दृष्टि के साथ-साथ संस्थागत सुधारों—जैसे संपादकीय स्वतंत्रता की गारंटी, योग्य पत्रकारों की सक्रिय भर्ती और नीतियों में पारदर्शिता—पर समान रूप से बल देता है, तो यह बदलाव सचमुच ऐतिहासिक साबित हो सकता है।

सार्वजनिक प्रसारण की कल्पना होगी साकार

तब एक ऐसे सार्वजनिक प्रसारक की कल्पना साकार हो सकेगी, जो केवल सूचना देने तक सीमित न रहकर युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़े, किसानों की आवाज बने और वैश्विक मंच पर देश की सॉफ्ट पावर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाए। किसी भी संस्थान का ठोस और टिकाऊ पुनर्जागरण स्वायत्तता के बिना संभव नहीं होता। जब नेतृत्व अपनी भूमिका को केवल रचनात्मक दायरे तक सीमित रखकर राजनीतिक दबावों को नजरअंदाज करता है, तो वही मंच धीरे-धीरे एक संगठित, प्रभावशाली लेकिन पक्षपाती प्रचार तंत्र में सिमटने लगता है।

प्रसारण की पहचान ही निष्पक्षता

सार्वजनिक प्रसारण की पहचान निष्पक्षता, विविधता और सख्त जवाबदेही से निर्मित होती है, जो उसकी विश्वसनीयता का आधार हैं। ऐसे संवेदनशील और निर्णायक दौर में जोशी के सामने स्पष्ट परीक्षा है—वे अपनी कविताओं से निकली संवेदनशीलता, दृष्टि और संतुलन को ठोस नीतियों में ढालकर संस्था को नई दिशा, ऊर्जा और भरोसा दे सकते हैं, या फिर इसे अतीत की कहानी का एक और विस्तारित अध्याय बनाकर छोड़ सकते हैं।

बदलाव के साथ चरित्र गढ़ने का समय

यह क्षण केवल बदलाव का संकेत नहीं, बल्कि भरोसे, दृष्टि और चरित्र को फिर से गढ़ने की निर्णायक घड़ी है। प्रसून जोशी के सामने एक साथ अवसर और कसौटी खड़ी है—यदि वे डिजिटल युग की मांग, सांस्कृतिक गहराई की सच्ची समझ और संपादकीय स्वतंत्रता की ठोस मर्यादा को एक सूत्र में पिरो पाते हैं, तो प्रसार भारती न सिर्फ अपनी खोई साख को पुनः अर्जित करेगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की निर्भीक और विश्वसनीय आवाज बनकर उभरेगा। पर यदि यह संतुलन बिखर गया, तो यह पहल भी औपचारिकता में सिमटकर एक और राजनीतिक निर्णय बन जाएगी। अंततः फैसला इसी पर टिकेगा—क्या वे अपनी रचनात्मक चेतना को स्वतंत्र दिशा देंगे, या उसे सत्ता के स्वर में ढाल देंगे।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

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