Site icon Dainik Savera Times

CJI पर जूता फेंकने वाले राकेश किशोर कौन है? इतने बार एसोसिएशनों की मिली हुई है सदस्यता, पढ़ें…

Rakesh Kishore

Rakesh Kishore

Rakesh Kishore : सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की एक नियमित सुनवाई उस वक्त अचानक तनावपूर्ण हो गई जब एक वरिष्ठ वकील ने देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई पर अदालत कक्ष के भीतर जूता फेंक दिया। घटना ने न केवल अदालत की गरिमा को झकझोर दिया, बल्कि देश की न्यायिक प्रणाली के भीतर असहमति जताने के तरीकों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

जूता फेंकने के बावजूद शांत रहे CJI
अदालती सूत्रों के अनुसार, जूता चीफ जस्टिस को नहीं लगा और उनके पैरों के पास जाकर गिरा। इसके बावजूद, CJI गवई ने पूरी शालीनता के साथ स्थिति को संभाला और कहा, “इस तरह की घटनाएं मुझ पर असर नहीं डालतीं। आप लोग अपनी दलीलें जारी रखें।” अदालत की कार्यवाही बाधित नहीं हुई, और अन्य जजों ने भी संयम बरतते हुए कार्यवाही को जारी रखा।

यह भी पढ़ें- देशभर में बदला मौसम का मिजाज, कहीं बारिश तो कहीं ठंड ने दी दस्तक, IMD ने जारी किया अलर्ट

आरोपी कौन है?
जूता फेंकने वाले व्यक्ति की पहचान 72 वर्षीय राकेश किशोर के रूप में हुई है, जो सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पंजीकृत वकील हैं। वे दिल्ली के मयूर विहार इलाके में रहते हैं और 2009 से दिल्ली बार काउंसिल के सदस्य हैं। उनके पास शाहदरा बार एसोसिएशन, दिल्ली बार काउंसिल और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की सदस्यता पाई गई है। घटना के समय, किशोर ने अदालत में चिल्लाते हुए कहा, “सनातन का अपमान नहीं चलेगा।” इसके बाद उन्हें कोर्ट स्टाफ ने तत्काल पकड़ लिया और दिल्ली पुलिस को सौंप दिया। उन्हें त्वरित हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी गई है।

किस मामले में हुआ था विवाद?
यह अप्रत्याशित घटना उस समय हुई जब अदालत खजुराहो के जवारी मंदिर परिसर में भगवान विष्णु की क्षतिग्रस्त प्रतिमा की पुनर्स्थापना से जुड़ी याचिका पर पिछली सुनवाई के संदर्भ में चर्चा कर रही थी। दरअसल, 16 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें सात फुट ऊंची विष्णु प्रतिमा को दोबारा स्थापित करने की मांग की गई थी। अदालत ने इसे “प्रचार हित याचिका” करार देते हुए कहा था, “जाइए और स्वयं भगवान से कुछ करने को कहिए। आप प्रार्थना कीजिए और ध्यान कीजिए।” यह टिप्पणी CJI गवई द्वारा की गई थी, जिसे कई हिंदू संगठनों और सामाजिक समूहों ने ‘सनातन धर्म का अपमान’ बताया।

इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं, और कई समूहों ने अदालत से माफी की मांग की थी। सोमवार की घटना उसी संदर्भ में देखी जा रही है।

न्यायपालिका पर हमला या असहमति की सीमा पार?
कानून विशेषज्ञों और वरिष्ठ वकीलों ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी बयान जारी कर कहा है कि, “हम न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता के साथ खड़े हैं। अदालत परिसर में इस तरह की हिंसात्मक घटनाएं पूरी तरह अस्वीकार्य हैं।” वहीं, कुछ विचारकों का कहना है कि यह घटना मौजूदा सामाजिक-धार्मिक तनाव का प्रतीक है, जो अब न्यायालयों तक पहुंचने लगा है।

Exit mobile version