सिकुड़ते जंगल, बढ़ता भय — कौन चुकाएगा विकास की कीमत?

Shrinking forests, growing fear : जंगलों से उठती आह अब गांवों की दहलीज तक सुनाई देने लगी है। आधी रात खेतों में उतरते हाथी, बस्तियों के आसपास मंडराते तेंदुए और घरों की चौखट तक पहुंचते बाघ केवल वन्यजीव नहीं, बल्कि उस अंधाधुंध विकास के मौन साक्ष्य हैं जिसने उनसे उनका आशियाना छीन लिया। प्रकृति को … Continue reading सिकुड़ते जंगल, बढ़ता भय — कौन चुकाएगा विकास की कीमत?