नई दिल्ली: : अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की प्रवक्ता जेन साकी ने संकेत दिया है कि अमेरिका आर्थिक कारणों से रूस से रियायती तेल खरीदने की भारत की योजना को समझ सकता है। यह भी बताया गया कि साकी ने अपनी ब्रीफिंग में पुष्टि की थी कि अगर भारत रूस से तेल आयात करता है तो वह अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन नहीं करेगा। रूस की अपनी हालिया यात्र में विदेश मंत्री जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रपति बाइडेन ने भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने को मान्यता दी है क्योंकि इससे वैश्विक तेल कीमतें स्थिर हुई हैं। अब डोनाल्ड ट्रंप का प्रवेश होता है। ऐसा लगता है कि रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत से उनकी अनबन है।
भारतीय निर्यात की एक विस्तृत श्रृंखला पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने के अमेरिकी राष्ट्रपति के कदम को केवल एक भू-राजनीतिक चाल के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह व्यापार वार्ताओं में गहरे संरचनात्मक टकराव को दर्शाता है, जहां कृषि और डेयरी लगातार रुकावट बनकर उभरे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका लंबे समय से भारत की सुरक्षात्मक कृषि नीतियों की आलोचना करता रहा है-न्यूनतम समर्थन मूल्य और निर्यात प्रतिबंधों से लेकर डेयरी आयात पर टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं तक-जो मुक्त व्यापार सिद्धांतों के साथ असंगत हैं (यूएसटीआर वार्षिक रिपोर्ट, 2024)। बदले में भारत का तर्क है कि उसका कृषि क्षेत्र जो विश्व बैंक की 2023 के आंकड़ों के अनुसार लगभग 42 प्रतिशत कार्यबल को सहारा देता है ग्रामीण आजीविका और खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाले बिना विदेशी प्रतिस्पर्धा के संपर्क में नहीं आ सकता।
हाल ही में वाशिंगटन द्वारा अमेरिकी डेयरी और कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार में व्यापक पहुंच की मांग पर जोर देने के बाद वार्ता विफल हो गई, जबकि नई दिल्ली ने डेयरी उपभोग में धार्मिक संवेदनशीलता और छोटे किसानों को संरक्षण देने की आवश्यकता के आधार पर इसका विरोध किया। खेती और डेयरी के मुद्दे पर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पलटवार करने का फैसला किया है। ट्रम्प की घोषणा के एक दिन बाद 7 अगस्त को दिल्ली में उन्होंने कहा, ‘भारत अपने किसानों, डेयरी और मछुआरों की भलाई से कभी समझौता नहीं करेगा।’ भारतीय डेयरी और किसान प्रधानमंत्री के लिए महत्वपूर्ण क्यों भारत सरकार के अनुसार लगभग 48.2 अरब डॉलर मूल्य के भारतीय उत्पाद (2024 के निर्यात मूल्यों के आधार पर) अमेरिका की विस्तारित 50 प्रतिशत टैरिफ व्यवस्था के अंतर्गत आएंगे। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएिटव ने चेतावनी दी है कि इन टैरिफ के कारण निर्यात में 50 अरब डॉलर तक की गिरावट आ सकती है।
भारत की प्रतिक्रिया दृढ़ रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों, दुग्ध उत्पादकों और मछुआरों के हित में, चाहे इसके लिए उन्हें राजनीतिक कीमत ही क्यों न चुकानी पड़े, न झुकने का संकल्प लिया है। ये कृषि सुरक्षा उपाय राजनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। हालांकि डेयरी और कृषि क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान घट रहा है-यह अब 18-20 प्रतिशत के बीच है-फिर भी आजीविका में इसकी भूमिका बहुत बड़ी है, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत में। भारत में कृषि और डेयरी केवल आर्थिक क्षेत्र नहीं हैं-वे ग्रामीण जीवन में गहराई से समाहित हैं। छोटे किसानों के लिए-जो अक्सर कुछ ही मवेशी रखते हैं और स्थानीय चारे पर निर्भर रहते हैं-डेयरी ग्रामीण असुरक्षा के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच का काम करती है। टैरिफ सुरक्षा में ढील खाद्य सुरक्षा को बाधित कर सकती है और आत्मनिर्भरता की दिशा में दशकों की नीतिगत प्रगति को उलट सकती है (ट्राइकॉन्टिनेंटल)।
डेयरी उद्योग में राष्ट्रीय गौरव की गहरी भावना भी समाहित है, जिसे प्रबुद्ध नीति-निर्माण और तकनीकी प्रगति की गरीबी-उन्मूलनकारी विजय के रूप में देखा जाता है। भारत वैश्विक डेयरी उत्पादन में एक प्रमुख स्थान रखता है, जो दुनिया के लगभग 24 प्रतिशत दूध का उत्पादन करता है, जिसका उत्पादन लगभग 239 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच जाता है-जो संयुक्त राज्य अमेरिका के दोगुने से भी अधिक है (रॉयटर्स)। यह स्थायी शक्ति दशकों के रणनीतिक विकास और संरचनात्मक समर्थन से उपजी है। फिर भी अपने व्यापारिक साङोदारों-विशेष रूप से अमेरिका-के दृष्टिकोण से, भारत का डेयरी क्षेत्र प्रणालीगत अक्षमताओं का उदाहरण है: इसे अत्यधिक खंडित, टैरिफ और जटिल गैर-टैरिफ उपायों द्वारा अत्यधिक संरक्षित, सब्सिडी पर निर्भर और पर्यावरणीय रूप से बोझयुक्त माना जाता है, विशेष रूप से अपने विशाल पशुधन आबादी से मीथेन उत्सर्जन के माध्यम से। डेयरी तक पहुंच लगातार वार्ता में एक लाल रेखा रही है-न केवल अमेरिका के साथ, बल्कि यूरोपीय संघ के साथ भी।
यह ब्रिटेन के हाल ही में हस्ताक्षिरत मुक्त व्यापार समझौते के सबसे विवादास्पद तत्वों में से एक थी और कथित तौर पर 2019 में एक प्रमुख क्षेत्रीय व्यापार समझौते से भारत के हटने में इसने केंद्रीय भूमिका निभाई (इकोनॉमिक टाइम्स)। भारत का डेयरी प्रभुत्व डॉ. वर्गीज कुरियन के मार्गदर्शन में 1970 में शुरू की गई श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड) से जुड़ा है। तीन दशकों के भीतर इस कार्यक्रम ने भारत को एक दूध आयातक देश से दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक देश में बदल दिया, प्रति व्यक्ति उपलब्धता को दोगुना कर दिया और सहकारी समितियों के इर्द-गिर्द संरचित एक आत्मनिर्भर ग्रामीण उद्योग का निर्माण किया। यह विरासत कायम है। यह क्षेत्र छोटे किसानों के घरों में गहराई से निहित है, लाखों ग्रामीण परिवार एक या दो गोवंशीय पशु रखते हैं, गोबर का उपयोग खाद के रूप में करते हैं और डेयरी उत्पादन को आर्थिक कमजोरी के खिलाफ एक बफर के रूप में प्रबंधित करते हैं।
इसी आधार पर मोदी सरकार ने आधुनिकीकरण और विस्तार की पहल श्वेत क्रांति 2.0 शुरू की है। सितंबर 2024 में आधिकारिक रूप से शुरू किए गए इस कार्यक्रम का उद्देश्य सहकारी ढांचे को मजबूत करना है-जिसका एक रणनीतिक लक्ष्य है: अगले पांच वर्षों में सहकारी दूध की खरीद में 50 प्रतिशत की वृद्धि करना (पीआईबी)। इसके अलावा यह पहल व्यापक लक्ष्यों की तलाश में है: महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना (डेयरी कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत है), ग्रामीण आय में सुधार और गुणवत्ता एवं वितरण की कमियों को दूर करना। स्थिरता की दिशा में भी प्रयास बढ़ रहे हैं-बेहतर आहार प्रथाओं, आनुवंशिक सुधारों और कम उत्सर्जन वाली तकनीकों के माध्यम से मीथेन उत्सर्जन को कम करने के प्रयास चल रहे हैं। एक किसान-समर्थक प्रधानमंत्री हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दोनों ही खुद को किसानों के हिमायती बताते हैं, लेकिन उनके कृषि क्षेत्रों-खासकर डेयरी फार्मिंग-की हकीकत बिल्कुल अलग है।
यूएसडीए के अनुमानों के अनुसार, भारत में लगभग 20 करोड़ मवेशी हैं, जिनमें लगभग 6.2 करोड़ डेयरी गायें शामिल हैं। फिर भी उत्पादन की संरचना अत्यधिक छोटे पैमाने की है: औसत झुंड में चार से भी कम मवेशी होते हैं और औसत खेत का आकार केवल एक हैक्टेयर है। लगभग 8 करोड़ ग्रामीण परिवारों के पास कम से कम एक गाय या भैंस है, जो डेयरी को घरेलू अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन में गहराई से समाहित करता है (एफएओ, 2024; यूएसडीए, 2023)। इसके विपरीत अमेरिका का डेयरी क्षेत्र अत्यधिक समेकित है। अमेरिका में केवल लगभग 24,000 डेयरी फार्म हैं, जिनमें से प्रत्येक में औसतन लगभग 390 गायें हैं, जिन्हें यंत्रीकृत दूध देने, उन्नत चारा प्रणालियों और गहन उत्पादकता वृद्धि (यूएसडीए, 2023) द्वारा समर्थित किया जाता है।
उत्पादकता का अंतर चौंकाने वाला है: एक अमेरिकी डेयरी गाय भारतीय गाय की तुलना में औसतन छह से सात गुना अधिक दूध का उत्पादन करती है (एपी, 2023)। भारतीय मॉडल अपनी सहकारी प्रणाली द्वारा कायम है, जो किसानों को उनके दूध के लिए एक खरीदार की गारंटी देती है और बाजार मूल्य बढ़ने पर बोनस के माध्यम से लाभ साझा करती है। श्री मोदी और उनके करीबी सहयोगी गृहमंत्री अमित शाह दोनों के ही गृह राज्य गुजरात में स्थित अमूल जैसी प्रमुख सहकारी संस्थाएं अरबों डॉलर के उद्यमों में विकसित हुई हैं और जमीनी स्तर के पूंजीवाद की प्रतीक हैं। यह मॉडल इतना सफल है कि जुलाई 2024 में सरकार ने पर्यटन और नवीकरणीय ऊर्जा सहित अन्य उद्योगों में सहकारी सिद्धांतों का विस्तार करने की योजना की घोषणा की (इकोनॉमिक टाइम्स में रिपोर्ट)।
लेकिन उत्पादकता भारत की कमजोरी बनी हुई है। दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक होने के बावजूद प्रति गाय भारतीय डेयरी उत्पादन अंतरराष्ट्रीय मानकों से बहुत पीछे है। छोटे किसानों को बचाने के लिए भारत दुनिया के कुछ सबसे ऊंचे डेयरी टैरिफ बनाए रखता है। इस तरह के संरक्षण के बिना छोटे भारतीय डेयरी किसान शायद बर्बाद हो जाएंगे। प्रधानमंत्री मोदी इन कमजोर भारतीयों को दुनिया की सबसे ताकतवर ताकत से बचा रहे हैं। हालांकि, टैरिफ अमेरिका की शिकायत का केवल एक हिस्सा हैं। भारत ने लंबे समय से कृषि में प्रतिबंधात्मक गैर-टैरिफ बाधाएं बनाए रखी हैं, आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों (कपास को छोड़कर) के आयात पर प्रतिबंध लगाया है और आयातित डेयरी उत्पादों को ‘शाकाहारी दूध’ के रूप में प्रमाणित करने की आवश्यकता है-अर्थात, उन गायों से प्राप्त दूध, जिन्हें अस्थि चूर्ण जैसे पशु उपोत्पाद नहीं खिलाए जाते।
यह विनियमन पहली बार 2003 में यूरोप में बोवाइन स्पॉन्जिफॉर्म एन्सेफैलोपैथी (बीएसई, या ‘पागल गाय रोग’) के डर के बीच लागू किया गया था (रॉयटर्स, 2025)। भारत के लिए डेयरी एक राजनीतिक अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा है: लगभग 8 करोड़ परिवार इस पर निर्भर हैं, जिनमें से अधिकांश जीविका के लिए या छोटे किसान हैं जो स्थिरता और अस्तित्व के लिए अमूल जैसी सहकारी समितियों पर निर्भर हैं। 2019 में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साङोदारी (आरसीईपी) से भारत के हटने में डेयरी विवाद अहम भूमिका निभा रहे थे। राष्ट्रपति ट्रंप के प्रशासन में टैरिफ बढ़ने के साथ भारत की डेयरी ‘रेड लाइन्स’ एक बार फिर उसकी वैश्विक व्यापार कूटनीति की सीमाओं को परिभाषित कर रही हैं। अंतत: दूध को लेकर लड़ाई सिर्फ टैरिफ, कोटा या प्रमाणन मानकों तक सीमित नहीं है। इसका संबंध खेती और ग्रामीण जीवन के दो मॉडलों से है।