Site icon Dainik Savera Times

SIR पर आया सुप्रीम फैसला, CJI सूर्यकांत ने कहा ECI के पास संवैधानिक अधिकार

SIR verdict

SIR verdict

SIR verdict: बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले में निर्णय दिया।

याचिकाओं में चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे SIR की वैधता को चुनौती दी गई थी। अदालत को यह तय करना था कि क्या चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 326, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उससे जुड़े नियमों के तहत वर्तमान स्वरूप में एसआईआर कराने का अधिकार है।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत ने कई महत्वपूर्ण सवालों पर विचार किया। इनमें यह भी शामिल था कि क्या चुनाव आयोग को SIR कराने का संवैधानिक अधिकार है और क्या SIR के जरिए आयोग नागरिकता तय करने की कोशिश कर रहा है।

ये भी पढ़ें- US Iran war: ईरान की अमेरिका को खुली चेतावनी, कहा- अगर हमले जारी रहे तो…

 

जरूरत के मुताबिक उठाए गए कदम
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर चुनाव आयोग को SIR कराने का अधिकार है, तो यह भी देखना होगा कि उसकी प्रक्रिया क्या होगी। हालांकि, केवल प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों के आधार पर पूरे SIR को अवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी हैं। पीठ ने यह भी कहा कि यह सवाल उठाया गया कि क्या इस समय SIR कराने की कोई वैध आवश्यकता है। अदालत की राय में SIR के दौरान उठाए गए कदम जरूरत के मुताबिक थे।

दलील हुई खारिज
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि SIR बिहार में चुनाव प्रक्रिया और स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक दायित्व से ध्यान नहीं भटकाता। उन्होंने मतदाताओं पर खुद को साबित करने का बोझ डालने वाली दलील को भी खारिज कर दिया।

पुराने रिकॉर्ड में मौजूद रहेगा नाम
उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने पुराने निवास स्थान से कहीं और रहने लगा है, तब भी वह पुरानी SIR प्रक्रिया से बाहर नहीं हो जाता। उसका या उसके परिवार का नाम पुराने रिकॉर्ड में मौजूद होगा। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग ने दस्तावेजों की विश्वसनीयता के आधार पर उन्हें सूची में शामिल किया है और इसे मनमाना नहीं कहा जा सकता।

ECI सही दस्तावेज न होने पर काट सकता है नाम
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह नहीं माना जा सकता कि SIR का उद्देश्य लोगों को मतदाता सूची से बाहर करना था। अगर कोई दस्तावेज सही नहीं पाया जाता है, तो चुनाव आयोग मतदाता सूची में नाम शामिल करने से इनकार कर सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आयोग नागरिकता तय कर रहा है।

ये भी पढ़ें- IPL 2026 Orange Cap: ऑरेंज कैप की रेस में कोहली की किंग स्टाइल एंट्री, बढ़ा रोमांच

पीठ ने कहा कि अदालत का निष्कर्ष है कि SIR संविधान और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की कसौटी पर खरा उतरता है।

चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं करता: SC
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि इतने विस्तृत कार्य को देखते हुए चुनाव आयोग को नियम और प्रक्रिया तय करने का अधिकार है। चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं करता। हालांकि, वह संदिग्ध लोगों के मामलों को केंद्र सरकार को भेज सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि चुनाव आयोग जिन लोगों की नागरिकता पर संदेह जताता है, उनकी जानकारी 4 सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकरण को दे। सक्षम प्राधिकरण अगले चुनाव से पहले तक उनके बारे में निर्णय ले।

ये थे मुख्य याचिकाकर्ता
इस मामले में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, पीयूसीएल समेत कई संगठनों और विपक्षी नेताओं ने याचिकाएं दाखिल की थीं। याचिकाकर्ताओं में मनोज झा, महुआ मोइत्रा, के. सी. वेणुगोपाल, पप्पू यादव और राजद सांसद सुधाकर सिंह भी शामिल हैं।

Exit mobile version