नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को देश भर में डिजिटल गिरफ्तारी घोटालों की घटनाओं के संबंध में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किए।
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सभी राज्यों से जांच के लिए लंबित साइबर गिरफ्तारी मामलों का विवरण प्रस्तुत करने को कहा और मामले की सुनवाई 3 नवंबर के लिए स्थगित कर दी।
इसने मामले की जाँच केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने पर भी विचार किया और पूछा कि क्या सीबीआई के पास देश भर में ऐसे सभी मामलों को संभालने के लिए संसाधन हैं।
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सीबीआई पहले से ही ऐसे कुछ मामलों से निपट रही है। पीठ ने कहा, “कृपया पता करें कि क्या सीबीआई के पास सभी मामलों को संभालने के लिए संसाधन हैं।” पीठ ने कहा कि वह एक समान जाँच चाहती है, लेकिन राज्यों का पक्ष सुने बिना आज कोई निर्देश जारी नहीं करेगी।
इससे पहले, शीर्ष अदालत ने डिजिटल गिरफ्तारी घोटालों की घटनाओं का स्वतः संज्ञान लिया था, जहाँ धोखेबाज़ कानून प्रवर्तन एजेंसियों या न्यायिक अधिकारियों का रूप धारण करके नागरिकों, विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों से पैसे ऐंठते हैं।
शीर्ष अदालत ने पिछली सुनवाई में कहा था कि न्यायाधीशों के जाली हस्ताक्षरों वाले न्यायिक आदेशों का निर्माण न्यायिक प्रणाली और कानून के शासन में जनता के विश्वास की नींव पर प्रहार करता है। उसने कहा था कि इस तरह की कार्रवाई संस्था की गरिमा पर “सीधा हमला” है।
पीठ ने कहा था, “न्यायाधीशों के जाली हस्ताक्षरों वाले न्यायिक आदेशों का निर्माण न्यायिक प्रणाली में जनता के विश्वास की नींव पर प्रहार करता है, न कि कानून के शासन पर। इस तरह की कार्रवाई संस्था की गरिमा पर सीधा हमला है। इस तरह के गंभीर आपराधिक कृत्य को धोखाधड़ी या साइबर अपराध के सामान्य या नियमित अपराध के रूप में नहीं माना जा सकता।”
शीर्ष अदालत ने कहा था कि न्यायिक दस्तावेजों की जालसाजी, जबरन वसूली, निर्दोष लोगों, खासकर वरिष्ठ नागरिकों से लूट से जुड़े इस धंधे की पूरी हद तक पर्दाफाश करने के लिए केंद्र और राज्य पुलिस के बीच समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।
पीठ ने पिछले हफ़्ते एक वरिष्ठ नागरिक दंपत्ति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में की गई शिकायत का स्वतः संज्ञान लिया, जिनकी जीवन भर की जमा-पूंजी डिजिटल गिरफ्तारी घोटाले के ज़रिए ठगी गई थी।
अंबाला की 73 वर्षीय महिला ने आरोप लगाया कि घोटालेबाज़ों ने उन्हें डिजिटल गिरफ्तारी में फँसाने और एक करोड़ रुपये से ज़्यादा की उगाही करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के जाली आदेशों का इस्तेमाल किया। उन्होंने दावा किया कि धोखेबाज़ों ने कथित तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा जारी एक फ़र्ज़ी आदेश पेश किया।
सर्वोच्च न्यायालय ने गृह मंत्रालय के सचिव के माध्यम से भारत संघ; अपने निदेशक के माध्यम से सीबीआई; गृह विभाग के प्रमुख सचिव; और अंबाला के साइबर अपराध पुलिस अधीक्षक को नोटिस जारी किए थे। इसने हरियाणा सरकार और अंबाला के साइबर अपराध पुलिस अधीक्षक से अब तक की जाँच पर स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को भी कहा था।
पीठ ने इस मुद्दे पर भारत के महान्यायवादी से भी सहायता मांगी थी।
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