नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वीरवार को कहा कि विधेयकों के भविष्य पर फैसला करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 200 में इस्तेमाल वाक्यांश ‘यथाशीघ्र’ से कोई व्यावहारिक उद्देश्य पूरा नहीं होगा, यदि राज्यपालों को ‘अनंतकाल’ तक मंजूरी रोककर रखने की अनुमति है। 5 जजों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी की जबकि केंद्र ने कहा कि राज्य सरकारें विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को लेकर राष्ट्रपति और राज्यपाल की कार्रवाई के खिलाफ मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को लेकर शीर्ष कोर्ट में रिट याचिका दायर नहीं कर सकतीं। शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर अनुच्छेद 200 में पूर्व की 6 सप्ताह की सीमा की जगह ‘यथाशीघ्र’ वाक्यांश को शामिल किया और केंद्र से पूछा कि क्या विधेयकों के भाग्य का फैसला करते समय इस वाक्यांश को नजरअंदाज किया जा सकता है।
अनुच्छेद 200 राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों के संबंध में राज्यपाल को शक्तियां प्रदान करता है, जिसके तहत वह विधेयक पर अपनी सहमति दे सकते हैं, अपनी सहमति रोक सकते हैं, विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं या विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकते हैं। अनुच्छेद 200 के एक प्रावधान में कहा गया है कि राज्यपाल, विधेयक को स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किए जाने के बाद यथाशीघ्र, विधेयक को, यदि वह धन विधेयक नहीं है, सदन में पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं और विधानसभा द्वारा पुनर्विचार करने तथा उसे वापस भेजने के बाद वह अपनी सहमति नहीं रोकेंगे।
चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कहा, ‘सवाल तब उठता है जब राज्यपाल विधायिका द्वारा पारित विधेयक को रोककर रखते हैं और उसे दबाए रखते हैं। इसके लिए ‘यथाशीघ्र’ शब्द का इस्तेमाल किया गया था.. पहले यह 6 सप्ताह की सीमा थी और बाद में इसे ‘यथाशीघ्र’ कर दिया गया और मसौदा समिति के एक सदस्य ने कहा कि ‘यथाशीघ्र’ या ‘जितनी जल्दी हो सके’ का मतलब तत्काल होगा.. अगर संविधान निर्माताओं का यही विचार था तो क्या हम इसे नजरअंदाज कर सकते हैं।’ तमिलनाडु की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने कहा कि यह तर्क कि राज्यपाल विधानसभा द्वारा पारित धन विधेयकों पर भी अपनी मंजूरी रोक सकते हैं, प्रभावी रूप से उन्हें राज्य का ‘सुपर मुख्यमंत्री’ बना देगा।
उन्होंने कहा कि किसी विधेयक को रोके रखने पर उसे विधानसभा में वापस भेजना होगा और यदि राज्यपालों को अपनी सहमति स्थायी रूप से रोकने की अनुमति दी जाती है तो यह संपूर्ण अनुच्छेद 200 का उपहास करेगा और यह प्रावधान उसे निगल जाएगा। चीफ जस्टिस ने कहा, ‘अन्यथा, यदि आप अनंत काल तक (सहमति) रोके रखते हैं तो शब्द यथाशीघ्र निर्थक (कोई व्यावहारिक उद्देश्य पूरा न करने वाला) हो जाएगा।’
राज्यपाल धन विधेयकों पर भी स्वीकृति रोककर रख सकते हैं, इस दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए सिंघवी ने एक पीठ से कहा, ‘यह इस धारणा के अनुरूप है कि राज्यपाल प्रभुत्व की स्थिति में नहीं हैं, बल्कि वह एक सुपर मुख्यमंत्री हैं।’ संविधान सभा में हुई बहस का जिक्र करते हुए सिंघवी ने कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति नाममात्र के प्रमुख हैं, जिनके पास कार्यकारी निर्णय लेने में कोई विवेकाधिकार नहीं है, सिवाय कुछ लोगों के।
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