नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के अंबाला में अदालत और जांच एजैंसियों के फर्जी आदेशों के आधार पर एक बुजुर्ग दंपति को ‘डिजीटल अरैस्ट’ कर उनसे 1.05 करोड़ रुपए की उगाही की घटना को शुक्रवार को गंभीरता से लिया। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने देश भर में डिजीटल अरैस्ट के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई और 73 वर्षीय महिला द्वारा भारत के प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई को लिखे पत्र पर स्वत: संज्ञान लेते हुए दर्ज किए गए मामले में केंद्र और सीबीआई से जवाब मांगा।
पीठ ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों सहित निदरेष लोगों को डिजीटल अरैस्ट करने के लिए सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट के आदेशों और जजों के हस्ताक्षरों की जालसाजी करना न्यायिक संस्थाओं में लोगों के विश्वास और आस्था पर कुठाराघात है। शीर्ष कोर्ट ने कहा, ‘जजों के जाली हस्ताक्षरों वाले न्यायिक आदेश तैयार करना, कानून के शासन के अलावा न्यायिक व्यवस्था में जनता के विश्वास की नींव पर कुठाराघात करता है। इस तरह की कार्रवाई संस्था की गरिमा पर सीधा हमला है।’
पीठ ने कहा कि इस तरह के गंभीर आपराधिक कृत्य को धोखाधड़ी या साइबर अपराध के सामान्य या एकल अपराध के रूप में नहीं माना जा सकता। पीठ ने अटॉर्नी जनरल से सहायता मांगी और हरियाणा सरकार तथा अंबाला साइबर अपराध विभाग को बुजुर्ग दंपति के मामले में अब तक की गई जांच पर एक स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। शीर्ष कोर्ट को बताया गया कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के विभिन्न प्रावधानों के तहत अंबाला स्थित साइबर अपराध विभाग में 2 प्राथमिकी दर्ज की गई हैं।
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